अभी तो यह पड़ाव है।

(काव्य संग्रह)

1) इस पार-उस पार
…………………………

इस पार हैं दुर्गम जंगल
उस पार शहर हैं सुंदर
इस पार-उस पार के मध्य
दौड़ती हैं भयानक सुरंग ।

उस पार हैं सभ्य शहरी
नज़र में उनके यहां सभी जंगली
शहरी पहनते कपड़े रंग बिरंगे
यहां के जंगली भूखे काले नंगे।

उस पार रात बिजलियों से दमकते
इस पार साँझ जुगनुओं से चमकते
वहां रफ़्तार भरी जिंदगी का ठेला
यहां नदियों के गर्भ में सुखा ढेला ।

सपनें सुरंग के इस पार नहीं
अपने सुरंग के उस पार नहीं
वहां पर चलता हैं हंसना रोना
यहां नयन में अश्रु न पेट में दाना ।

शहरियों को जंगली करते याद
अपनों से मिलने को रहते उदास
जंगल भाय भाय करती दुपहरी
जंगली मुस्कुराते उनके मिनिएचर।

शहर दर शहर कटेंगे जंगल
प्रार्थना अर्घ्य में न बचेंगे पीपल
तब इस पार भी होगा शहर
और उस पार भी होगा शहर
इस पार-उस पार के मध्य
दौड़ेगी अँधेरी भयानक सुरंग।
……………………………………


2) दिल्ली अभी दूर हैं
………………………….

चाहत की राह में मुश्किलें हज़ार
एक जीत के लिए कई बार हार

दृढ संकल्प में तन-मन समर्पित
स्वप्न और आस बिखरते बार बार

अमावश में सन्नाटा करे भयभीत
जुगनुओं के संग करेंगे बिहड़ पार

न जाने किस किनारे मिले पुरुषार्थ
जोर लगाकर मचा लहर हाहाकार

समय संग भाग्य कब देते सौगात
बेबसी में योद्धा होते नहीं लाचार

दिल्ली अभी दूर हैं हौसलें सम्भाल
ताज़ औ तख़्त करेंगे तेरा श्रृंगार
………………………………………


3) क्या हैं कविता लिखना ?
………………………………..

क्या हैं कविता लिखना ?
दर्द की यादों में
नंगे पैर गुजरना,
सच,कविता लिखना……..
भोगना हैं एक यातना ।

भाव की भंगिमा
औरों को समझाना,
सच,कविता लिखना…….
गूंगे की हैं भावना ।

अबोध की कोख में
पश्चाताप का जन्मना,
सच,कविता लिखना…….
क्षमाप्रार्थी की हैं याचना ।

निःस्वार्थ साधना में
यश-द्रव्य की अवहेलना,
सच,कविता लिखना……..
कवि की हैं आराधना ।

सच,कविता लिखना……..
पागल की हैं कल्पना ।
………………………………


4) मुझे देखो……….
…………………

आपने सुना होगा~
लोगों को मारते हुए
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी ।
मुझे देखो……..
मैंने कुछ नया कर दिखाया हैं ।
पैरो पर कुल्हाड़ी नहीं
कुल्हाड़ी पर पैर दे मारा हूँ  ।

आपने सुना होगा~
दूध के जलों को पीते हुए
फूँक फूँक कर छाछ ।
मुझे देखो………
मैंने कुछ नया कर दिखाया हैं।
गर्म छाछ को एक सांस में
बिन फूंके कई घूंट पी जाता हूँ ।

आपने सुना होगा~
ठोकरें बदा हो भाग्य में
मंजिल होती हैं नज़रों से दूर ।
मुझे देखो………
मैंने कुछ नया कर दिखाया हैं ।
समय और भाग्य से पहले
मिली मंजिल को बेच खाया हूँ ।
…………………………………….


5) लेकिन, मैंने देखा हैं !
……………………………..

किसी के एहसान का बोझ
मेरे अपने कन्धों पर हो,
बिलकुल पसन्द नहीं मुझे ।
मैं उठना चाहता हूँ,
कर्मठता के संकल्प पर
लेकिन,मैंने देखा हैं !
लता बेल की फुनगियों को
बांस की काठी से लपटते हुए
लटकते अंगूर के दाने ।

मेरी अपनी सफलता की अर्थी
गैरों के कन्धे पर हो,
भला कैसे सहन हो मुझे ?
मैं मरघट तक जाना चाहता हूँ,
अपनी सांसो के बल पर
लेकिन,मैंने देखा हैं !
तेल और बाती के सहारे
चटक अँधेरी रात में
जलते टिमटिमाते हुए दीपक ।
…………………………………….


6) ईर्ष्या द्वेष
…………………

फोड़ देना चाहता हूँ……..
उन आँखों को,
जो देखते हैं मेरी आँखों के सपने !!

तोड़ देना चाहता हूँ…….
उन टखनों को,
जो बढ़े मेरे कदमों से आगे !!

पोत देना चाहता हूँ……..
उन चेहरों पर कालिख,
स्वाभिमानी हैं मुझसे अति तेज !!

खरोंच देना चाहता हूँ………
उन कान के पर्दे,
जो सुनते नहीं मेरा गुणगान !!

भाग जाऊंगा बहुत दूर…….
उस भीड़ भाड़ से,
जो करती नहीं मेरा यशोगान !!

लेकिन मैं सोचता हूँ…….
ऐसा क्यों……..?
कहीँ ऐसा तो नहीं !!!

अभिमान का फन फैलाए
ईर्ष्या द्वेष का नाग
स्वार्थ के बिल में
अँधेरा छाने से डरता हैं ।
शायद इसीलिए
वह दूसरों की एड़ियां डंसता हैं ।।।
………………………………………


7) यादों की परछाई
…………………………

अंजान था
पीछे से
धीरे-धीरे
कदमों तले
चुपके-चुपके
आगे सरक गई
देखते-देखते
मेरी परछाई ।

कल क्या हो
कुछ ज्ञात नहीं
सोचते-सोचते
आज का पल
भोगते-भोगते
अतीत हुई
चूकते चौकते
मेरी यादें ।

परछाई की तरह
रेंगते-रेंगते
अतीत की यादें
सिसकते-सिसकते
पसर गई मेरे
थके बुझे
तन-मन में
यादों की परछाई ।
………………………..


8) आँखें
……………

दुःख
कतरा कतरा
टपकता हैं आँखों से

अभिमान
जगर मगर
चमकता हैं आँखों में

आशा
चम चम
झलकती हैं आँखों में

ईर्ष्या
तम-तम
उबलती हैं आँखों में

खामोश गूंगे की तरह
बहुत कुछ
कह जाती हैं आँखें
मानो या न मानो
आत्मा की दर्पण होती हैं आँखें
…………………………………….


9) एक और तड़प
……………………..

क्यों हैं नागफनी के कांटे मुझमे ?
क्यों करूँ दूजों के हृदय में घाव ?
सब हैं अपनी कर्मगति के चाकर,
निर्दोष हो मेरे मन के भाव ।
सिहरता हूँ सोचकर,
काल की क्रूरता ।
पिछड़ने और पराजय का
डर हैं कचोटता ।
………………………..


10) एक बात
……………………..

एक बात
जान लो तुम
कुछ नहीं जानते हो
बिलकुल शून्य हो
तो सम्भवत:
बहुत कुछ जान जाओगे।

मन में हैं भ्र्म
सब कुछ जानते हो
तो निश्चित:
कुछ भी न जान पाओगे ।

एक बात
साधारण सी बात
जिसने गहराई से जाना
समाज में

निगाहे जहा तक जाती है  ,

मंजिल न आये नज़र,
कहीँ दोष तो नहीं मेरी आँखों में
भटक तो नहीं गए डगर ।

लोगों का क्या जमाने को न देख,
गमीं में पीने न दें,
ख़ुशी में जीने न दें ।

किताबों में जिंदगी को इस कदर सहेज दो,
पन्ना दर पन्ना जिंदगानी का हरफ़ निखरता रहे ।
…………………………………….


11) छलना अपने आपको
…………………………………

कितना आसान हैं
छलना अपने आपको।

पलकों को मूंदकर
पुतलियों को घुमाना,
कितना आसान हैं
छलना अपने आपको ।

दूर धूसर रेगिस्तान में
बिता भर नखलिस्तान खोजना,
कितना आसान हैं
छलना अपने आपको ।

अर्जुन की गाथा पढ़ना
मछली की आँख भूलना,
कितना आसान हैं
छलना अपने आपको ।

होनी के परे कुछ नहीं
कर्तव्य धर्म हैं छलावा,
कितना आसान हैं
छलना अपने आपको ।

जो थक चुके हैं उगकर
उन नाखूनों को सहलाना,
कितना आसान हैं
छलना अपने आपको ।

चूक जाये मन ईमानदारी से,
थक जाये तन मेहनत मंजूरी से,
सन्तोष नहीं जो मिला योगयत्न से,
आसुंओं के स्वाद,
दिए की फड़फड़ाती लौ,
मदमस्त पाखियां,
शाश्वत प्रेम भाव को न समझना,
कितना आसान हैं
छलना अपने आपको ।

…………………………….


12) नाखून
……………….

मेरी आँखों के कोपल में
उग आये हैं नाख़ून
जो मासूम अबला के
खरोचते हैं सुंदर कोमल बदन ।

राह चलती युवतियों से
खुलेआम करता हूँ छेड़खानी
लेकिन न जाने क्यों
अपनी बहन की उँगलियों को
छूने से डरता हूँ ?

कहने-सुनने के लिए
लोगों की निगाह में
बहुत कुछ हूँ मैं……..
लेकिन मेरा मन मुझे
पहचानने से डरता हैं।
………………………………


13) तो
………..

धुप न लगती
तो छाँव में कौन बैठता ?
गर्मी की लू न बहती
तो अमराई कैसे महकती ???

आसूं न होते
तो अपना पराया क्यों होता ?
पलके न होती
तो सपनों को कौन सहेजता ???

दिन की थकान न होती
तो रात को कौन सोता ?
रात बेचैन न करती
तो दिन में कोई क्यों सोता ???

दलिद्रता की चीत्कार न होती
तो सम्पन्नता गर्व से कैसे फूलती ?
गरीबों की भीड़ न होती
तो कोई क्यों सलाम ठोकता ???

शब्दों में शक्ति न होती
तो भावना कविता कैसे गढ़ती ?
मन भावुक कोमल न होता
तो वह तोड़ती पत्थर कौन रचता ???

गोबर में दुर्गन्ध न होती
तो गुलाब को कौन सूंघता ?
डंठल में कांटे न होते
तो दामन को कौन सहेजता ???

हारने की शर्म न होती
तो गर्व गौरव कैसे जन्मती ?
मौत का खौफ़ न होता
तो जिंदगी कैसे रेंगती ???

अहंकार अँधा न होता
तो सोने की लंका कैसे दहकती ?
प्रतिस्पर्धा की आंच न होती
तो प्रतिभा कुंदन सी कैसे निखरती ???

अनुभव का अतीत न होता
तो पश्चाताप में कौन तड़पता ?
पराजय का भय न होता
तो मूक पत्थरों पर कौन सर रगड़ता ???

सपनों की दुनिया न होती
तो माथे लकीरों को क्यों पीटता ?
अंधियारे की कालिख न होती
तो साँझ की लौ कौन लेसता ???

दुःख का पहाड़ न होता
तो वैभव लक्ष्मी कौन भोगता ?
कीच का दलदल न होता
तो कमल कहां पर खिलता ???
……………………………………


14) क्या पता ?
…………………..

न हो तू निराश
न कर मन को उदास ।

न हो तू निराश
निराशा तुझे कर देगी
शून्य जीवन से हताश ।

न कर मन को उदास
उदासी छीन लेगी
तड़पते मन की आस ।

न हो तू निराश
न कर मन को उदास ।

अपने विह्वल मन में जगा
विश्वास की एक आस………….

आज की शाम
तू क्यों रात भर और
जीने से डरता हैं ………….
क्या पता !!!
कहीँ ऐसा हो जाये,
कल सुबह…………..
तू इस सूरज को रौशन कर दें !!!!

न हो तू निराश
न कर मन को उदास ।
………………………………


15) आस
……………

अमावश की रात
पूनम की अतीत नहीं,
साँसों का काफिला
पवन का अंत नहीं,
छोटी सी असफलता
सफलता की बाँझ नहीं,
देर हो सबेर हो
जल्दबाजी समझदारों की नहीं,
आज बीती कल न सही
परसो कहि गई तो नहीं,
अँधेरा कितना ही महीन हो
आस की बाती बुझे न कभी ।
……………………………………


16) दुःख
…………….

पश्चाताप जीवन का श्रेष्ठ अभिशाप हैं ।

दुःख न छोटा होता हैं।
दुःख न बड़ा होता हैं ।
दुःख न कम होता हैं ।
दुःख न ज्यादा होता हैं ।

दुःख व्यक्ति के अंतर्मन को सालती हैं।
प्रतिपल उसे सच की कसौटी पर तानती हैं।
सुख मिले साल भर हजारों साल।
बोध नहीं होता अवसान हुए कितने काल।
दुःख का एक पल जीवन माटी कर देता हैं।
इसिलए बूढ़ा बरगद अपनी रामकहानी सुनाता हैं ।
……………………………………


17) अभी तो यह पड़ाव हैं ।
…………………………………

साँझ ढल गई,
रात भर की बात हैं~
अभी तो यह पड़ाव हैं ।

रुके कदम बस,
उठने भर की चाह हैं~
अभी तो यह पड़ाव हैं।

ठौर नहीं छाँव में,
धुप से लगाव हैं~
अभी तो यह पड़ाव हैं।

ललक नहीं साथ की,
निज पर विश्वास हैं~
अभी तो यह पड़ाव हैं ।

एक नहीं और भी,
राह में ठहराव हैं~
अभी तो यह पड़ाव हैं ।

लौट कर करेंगे क्या,
जीतने के कई दांव हैं~
अभी तो यह पड़ाव हैं ।

हार जीत के द्वन्द में,
आलस्य से दुराव हैं~
अभी तो यह पड़ाव हैं ।
……………………………..


18) तड़प
………………

भावों की सरिता में हो
बहती शब्दों की धारा
कविता की डोंगी की डगमग
पतवार करती छप छप
मुट्ठी भर दुःख
क्षण भर की खुशियाँ
कविता से मिटती
मेरे मन की तड़प
……………………………..


19) खामोशियां
………………………………………

खामोशियाँ कितनी उदास होती हैं ।
अश्क जो बहे दर्द की सौगात होती हैं…

ये जिंदगी तेरी ख्वाहिशें कैसी कैसी।
पलकें,तन्हाई,धड़कनें बेचता हूँ…

तू कब थी मेरी कब तक रहेगी।
सब रुसवाइयों की अमानतें हैं……

जी सकु ना मर सकु ये कैसी सजा हैं।
तूने झूठ कहा था कि जिंदगी एक मजा हैं…..

पल पल मरता हूँ मुफ़्त में ।
पल पल जीने की कीमत अदा करता हूँ……..
………………………………


20) कुछ बकलोली
………………………

तोड़े कितने घरौंदे,जलाये कितने आशियाँ
ताज्जुब की न माथे पर शिकन न आँखों में शर्म हया ।

जो न परदादा ने सोची थी,
वो मैंने अपनी आँखों से देखि,
मॉडर्न जमाने के चोटियाँ गुथे समलिंगी लड़के बंगला कटाये लंगोट में लड़कियां ।


21) बकवास शायरी
………………………….

ईमानदारों की बेईमानी का सफ्फाक नज़ारा रहा ।
पत्तल में छेद देखो और उनका भरा पेट देखो ।।

ग़ज़ल की शग़ल में अपने जज़्बात बयां करो ।
रूठी मोहब्बत के रुख़ पलटने का इन्तिज़ार करो ।।

ईमान पर कब तक करे भरोसा ।
इंसान को काई पर फिसलते देखा ।।

तन्हाई में न समझो भले भीड़ से दूर ।
मेरी यादों के ख़जाने में हैं बीते लम्हों की भरमार ।।

हया थी जेहन में खुद से रूबरू होने की ।
बन्द पलकों से मैं दर्पण को निहारता रहा ।।

ठोकरें खा खाकर ठाकुर बने हैं जो आज ।
एड़ियां घिसता हर शख्स उन्हें कुकुर नज़र आता हैं ।।

एक हद तक चाहो मुद्दतों बाद जहमत बनेंगे ।
ज्यादती की नासूर बनेंगे प्यार किया तो खरोच लेंगे ।।

एड़ियां घिसती गई कपाल के बाल झड़ते रहे ।
नज़र न आया मन्ज़िल का कंगूरा ताउम्र चलते ही रहे ।।


22) गज़ल कैसे कैसे
………………………….

चिता पर पड़ी लाश अगर करवट बदल सके
सर को छुपा लेगा अपने घुटने से कफ़न खीचकर

मस्त लहरों का क्या साहिल पर आना जाना हैं उन्हें
न मिला ठिकाना तो आशिकों का नाम मिटाना हैं उन्हें

मेरी मुहब्बत अपनी वफ़ा को तूने भुला दिया
साहिल पर कुरेदे नाम को लहरों ने मिटा दिया

उजाले की आस अँधेरे में भटकता रहा मैं
कुछ पाने की ख्वाब बहुत कुछ खोता रहा मैं

ये जिंदगी ठहर न सकी क्या इतनी जल्दी थी
हम आस लगाये बैठे तू बेवफा निकल गई

बाँहों में तेरे आकर मानो जिंदगी थम सी गई
लौटना तो मुश्किल रहा मानो चलती सांसे रुक सी गई
…………………………………….


23) जी भरकर रो लिए
………………………………..

बदनशीबी ने क्या खूब पकड़ा हैं मेरे मुकद्दर का साथ
नज़र भी पड़ जाये लाख पर तो वो हो जाती हैं राख

आशिकी में इश्क़ का एक ही सौदा होना हैं
वफ़ा के नाम कुछ नहीं सिर्फ टूटे दिल का खिलौना हैं

जी भरकर रो लिए फिर भी मुंह बनाये हुए हैं
शायद हंसना भूल गए लोगों को भरमाये हुए हैं

इस वक़्त से क्या भागना उस वक़्त में भी होगा यही हाल
सुर्ख काली मूछों पर देख सीने पर उभरे पके बाल

फेरते हुए सर पर हाथ जिसके बचपन पर किया गुमान
आज उसी जवान को खांसते बूढ़े के और जीने पर हैं मलाल


24) आखिरी हाजिरी
…………………………..

मैं खुदा हूँ अपनी खुदाई का वहम कब तक ।
लोग मारेंगे पत्थर समझकर हकीकत तब तक ।।

जिंदगी भर के गमों का शायद यही इनाम मिला ।
कफ़न की तलाश में मुसाफिर को भटकना नहीं पड़ा ।।

न भीड़ हैं न हैं कोई मेला ।
संग मेरे आंसू और मैं अकेला ।।

नमाज़ में भीड़ नहीं भीड़ में नमाज होती हैं।
मीनारों पर कबूतर नहीं जब कौवों ने वजू की ठानी हैं ।।

हथेलियों में हैं फफोले जब तक ।
हाथ आते हैं पाने को फूंक तब तक ।।


मन की बात
……………….

क्यों बुना मैंने शब्दों का जाल ?
क्यों लिखी मैंने कविताएँ ?
जब इन प्रश्नों पर विचार करता हूँ तो मेरे मन से यही उत्तर आता हैं की भूखे आँतों की मानसिक अकड़न कविता लिखने को मजबूर करती हैं।

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