Struggler (Hindi Novel) [1]

स्ट्रगलर

फिल्मी दुनिया के अंधेरे कोनों को रौशन करने वाली एक दर्दनाक दास्तान…

यह उपन्यास फिल्मी दुनिया की कटु सच्चाई है। जिसे काल्पनिक घटनाओं एवं पात्रों के सहारे बयां किया गया है। जिसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से संबंध नहीं है । यदि किसी को इस रचना से तकलीफ होती है तो मैं हृदय से  क्षमा प्रार्थी हूँ क्योंकि मेरा उद्देश्य किसी के दिल को ठेस पहुँचाना नहीं बल्कि दूर-दराज के गाँव ,शहर एवं कस्बों से हीरो – हीरोइन बनने के लिए मुंबई आने वाली भीड़ को बॉलीवुड की कठिनाइयों से रू-ब-रू कराने का प्रयास है ।

***

स्ट्रगलर

( हिंदी उपन्यास / 2001 में नागपुर से प्रकाशित / सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित )

* फिल्मी दुनिया के अंधेरे कोनों को
 रोशन करने वाली एक दर्दनाक दास्तान
        * दूर-दराज के गाँव से चलकर मुंबई की सड़कों पर अपने सपने तलाशते युवकों की करुण गाथा।
    * सुनहरे संसार की चकाचौंध से गुमराह हो शरीर के रास्ते सफलता तलाशती  लड़कियों की मर्मस्पर्शी कहानी।
    * शून्य से उठकर शिखर पर सफलता का परचम लहरानेवालों, पीछे न मुड़ने की टेक में जिल्लत की जिंदगी का एक-एक दिन काटनेवालों के जीवन की सनसनीखेज तस्वीर  —
***
लेखकीय सोच…
शिखर , स्वामी , विशाल , बिहारी और अब्दुल यह तो सिर्फ कुछ नाम है पर इनके  सपनों से मिलते- जुलते सपने लिए बंबई आने वालों की संख्या काफी है क्योंकि बंबई सपनों का शहर है ।
स्ट्रगल तो हर किसी को करना पड़ता है । कुछ लोग भरे पेट संघर्ष करते हैं तो कुछ लोग खाली पेट…. लेकिन एक बात पक्की है कि स्ट्रगल के दिनों में बहुत पापड़ बेलने पड़ते है। भयंकर असहनीय पीड़ा भोगनी पड़ती है । सामाजिक उपहास को झेलना पड़ता है । फिल्मी दुनिया में असफलता का कड़वा घूंट पीकर लौट आए स्ट्रगलर और सीमा से पीठ पर गोलियां खाकर भाग्य आया सैनिक इन दोनों की समाज में कोई इज्जत नहीं होती।
बंबईया फिल्म इंडस्ट्री में स्ट्रगल करने वाला हर स्ट्रगलर हीरो नहीं बन पाता। कोई लेखक बन जाता है तो कोई कैमरामैन । कोई किसी का सेक्रेटरी बन जाता है तो कोई किसी का मेकअप मैन । कोई जूनियर आर्टिस्ट सप्लाई करने का धंधा करता है तो कोई लड़कियां सप्लाई करने का गोरखधंधा…….
जीवन का दूसरा नाम संघर्ष है…..फिल्मी दुनिया का संघर्ष केवल जीवट व्यक्ति ही झेल सकता है । फिल्मों में कुछ दिखाने के लिए जो संघर्ष करना पड़ता है उसमें  ऐरे – गैरे, नत्थू- खैरे कुछ ही महीना, वर्ष में अपनी हैसियत समझ कर इस लाइन से दूर हो जाते हैं । मैदान में रह जाते हैं कुछ स्टूगलर जो या तो अपना नाम कर जाते हैं अथवा हमेशा – हमेशा के लिए गुमनाम हो जाते हैंl
क्या आपने कभी सोचा  कि अगर बंबई शहर से फिल्मी हलचल को अलग कर दिया जाए तो क्या होगा….. सपनों की नगरी  बंबई का “चार्म” ही खत्म हो जाएगा । देश की आर्थिक राजधानी बंबई एक क्षण में बेजान हो जाएगी । बंबई का लोक सागर उस पर लहराता उम्मीदों का गागर, कोई पार लग गया तो कोई मझधार में डूब गया । डूबना या पार लगना,  यह तो किस्मत की बात है लेकिन आगे बढ़ने के लिए मरते दम तक प्रयास करना ही  “स्ट्रगलर”  का धर्म है।

…………राजेश दुबेय

******
फिल्म सिटी के फ्लोर नं. चार में अफरा तफरी मची हुई है। पिछले बीस दिनों में सेंटिंग डिपार्टमेंट के करीब साठ लोग प्रख्यात कला निर्देशक रमेश खत्री नेपाली के बनाये हुए स्केच को भव्य सेट का रूप दे रहे थे फिर भी आज “मुहुर्त” के दिन कहीं – कही रंग रोगन तो कहीं बड़े बड़े पोट्रेट लगाने के लिए ठोका पीटी चल रही है। बेस्ट सिनेमैटोग्राफी का कई बार आवार्ड ले चुके कैमरामैन प्रीतम सिंह के सहायक स्टुडियो फ्लोर की लकड़ी पट्टी पर मल्टी लाइट, कटर , रिफ्लेक्टर लाइटमैनों से लगवा रहें है। कैमरा ट्रोली के लिए चौबीस फीट की ट्रॅक बिछाई जा रही हैं। कोई सहायक निर्देशक ड्रेसमैन के साथ कपड़ों की  कन्टिन्यूटि को लेकर माथा पच्ची कर रहा है तो कोई मेकअप मैन की तलाश में भटक रहा है कि मेकअप रूम अभी बुक हुआ की  नहीं। लोगों को चाय-पानी पिलाने में चार -पाच स्पॉट बॉय अपनी -अपनी ट्रे के साथ यहाँ- वहाँ कूद रहे हैं। प्रोडक्शन असिस्टैन्ट हार ,फूल, नारियल, मिठाई, धूप, अगरबत्ती सब कुछ ले आया लेकिन दुकानदार से बिल लाना भूल गया। इस वजह से प्रोडक्शन मैनेजर उस पर चीख रहा है । तीन लोगों को छोड़कर युनिट का प्रत्येक व्यक्ति अपने – अपने काम में व्यस्त है। एक के बाद एक लगातार चार हिट फिल्म देने वाले निर्देशक श्रीधर बड़े इत्मीनान से अपनी कुर्सी पर पसरे हुए है कि जैसे उनकी यह पांचवी फिल्म ” धुरंधर” भी सुपरहिट साबित होगी I निर्माता जे.डी. शॉ, श्रीधर के सुपर हिट हुए पाँच करोड़ की बजट वाली फिल्म के ” मुहुर्त” को लेकर अति उत्साहित है। तीसरा व्यक्ति जिसे इस भीड़ के शोर शराबे से कोई लेना देना नहीं है, वह है सुपरस्टार रोहित कुमार का सचिव बिन्नी। तीनों बार – बार अपनी घड़ी  को देखकर चमेली और गेंदे के फूलों से सजाये हुये प्रवेश द्वार की ओर देख लेते हैं। मुहुर्त का समय बीते दो घंटे हो गये थे लेकिन सुपर स्टार रोहित कुमार का कहीं अता पता नहीं था।
 इतने में टाटा सुमो कार फ्लोर के पास आकर रुकी। कार को देखते ही जी.डी. शॉ अपनी कुर्सी से उठ खडे़ हुये और कार की ओर चल पड़े। श्रीधर और बिन्नी भी शॉ के साथ चल पड़े। ड्राइवर ने दरवाजा खोला। श्रीमती शॉ एक गेरूआ वस्त्रधारी वृद्ध संन्यासी के साथ बाहर निकली। जी. डी. शॉ ने प्रणाम करते हुये उनके चरण स्पर्श किये। श्रीधर और बिन्नी ने भी हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
” स्वामीजी,हीरो तो अभी आया नहीं। चलिए आप मेकअप रूम में आराम कीजिये। ” उन्होंने एक प्रोडक्शन असिस्टैन्ट को दिखाने का इशारा किया I मिसेज शॉ और स्वामीजी उस असिस्टैन्ट के पीछे मेकअप रूम की ओर चल पड़े।
” ये मेरे गुरुदेव है , आनंद स्वामीजी ।”   जी .डी. शॉ ने श्रीधर को बताया कि आज वो जो भी है सब स्वामीजी के अाशिर्वाद का फल है। उनकी फिल्म ” धुरंधर” का मुहुर्त पूजन आनंद स्वामीजी ही करेंगे I
अब तक सुपर स्टार रोहित कुमार स्टुडियों नहीं पहुँचे थे।बिन्नी ने यह सूचना जरूर दे दी थी कि वे सुबह नौ बजे अंधेरी में एक ज्वेलरी शॉप का उद्‌घाटन करने के बाद ही आयेंगे। समय बिताने के लिए निर्माता, निर्देशक आपस में चर्चा करने लगे कि इस फिल्म के लिए किस हिरोइन को साइन किया जाए?
शुटींग कवरेज करने आये पत्रकारों के लिए बैठने एवं चाय- पान की अलग से व्यवस्था की गई थी।सभी आपस में एक दूसरे से बतियाने में मस्त है। रात को नींद पूरी न होने की वजह से फिल्म पत्रकार राजजी कुर्सी पर बैठे- बैठे सो रहे हैं। क्राउड के लिए आये हुये एक्सट्रा कलाकार एक कोने में बैठे ताश खेल रहे हैं। ऎसा लगता है जैसे  इतने लोगों के होने के बाद भी सब कुछ अधूरा सा है। हर किसी को बस इंतजार है तो सुपर स्टार रोहित कुमार का।
उगते हुये सूरज को सभी नमस्कार करते है। सात – आठ साल पहले पृथ्वी थियेटर में पथिक ग्रुप के साथ ड्रामा करने वाले रोहित कुमार को आज से एक साल पहले तक कोई नहीं जानता था। एक सस्पेंस रोमांचक मर्डर मिस्ट्री फिल्म ” और गूंगा बोल उठा” सुपर डुपर हिट क्या हुई कि रोहित कुमार रातोंरात शोहरत की उस बुलंदी पर जा पहुँचा जहां से उसे अपने चारों ओर भीड़ ही भीड़ खड़ी दिखाई देती है जो उसके नाम का जाप कर रही है। फिल्म में नायक और खलनायक, दोनों रोल रोहित कुमार ने ही निभाये थे। डबल रोल में उनकी असाधाण अभिनय प्रतिभा को देखकर ” वर्ष का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता” का पुरस्कार दिया गया। आज लोगों को उन्हीं का बेसब्री से इंतजार है।
” रोहितजी आ गये, रोहितजी आ गये” के शोर के साथ पूरे स्टूडियों में जैसे तूफान सा आ गया । एक लाल चमचमाती मर्सिडीज कार बगीचे में आकर खड़ी हो गई। उसके पीछे एक मारूती कार भी आकर थोड़ी दूर पर रूक गई। निर्माता जे.डी. शॉ ने दौड़कर  कार का दरवाजा खोला। गोरा चिट्टा लंबा छरहरा नौजवान- रोहित कुमार आज का सुपर स्टार जिसके बाहर आते ही सैकड़ो कैमरे के फ्लैश चमचमा उठे। रोहित कुमार ने हाथ हिलाकर सभी का अभिवादन किया। मोटे मोटे गजरों के दो लम्बे हार लेकर प्रोडक्शन वाले पहुँच गये। निर्माता, निर्देशक ने मिलकर दोनों हार उनके गर्दन में लटका दिये। मुस्कराते हुये रोहित कुमार ने अपने आपको थोड़ा असहज महसूस किया। बिन्नी ने अपने बॉस की तकलीफ को ताड़ लिया। उसने तुरंत उनके गर्दन में फंसे हारों को निकालकर अपने हाथों में ले लिया। मारूति कार में से उनका पर्सनल मेकअप मैन , स्पॉट बॉय और एक हट्टा कट्टा बाडीगार्ड निकला जो अपने बॉस के पीछे हाथ बांधकर खडे़ हो गये। रोहित कुमार के सेट पर आते ही केवल काम के लोगों को अंदर आने की इज़ाजत थी, बाकी फालतू भीड़ गेट के बाहर I रोहितजी का मेकअप हो रहा है और सामने कुर्सी पर बैठे श्रीधरजी उन्हें सीन समझा रहे हैं । बीच -बीच में मोबाइल पर फोन भी आ रहे हैं जिन्हें उनकी इम्पॉरटेन्स के हिसाब से रोहित कुमार अटेन्ड कर लेते है। बाकी कॉलो को बिन्नी ही अटेन्ड करता था।
एक सीन को समझाने के बाद श्रीधर जब दूसरे सीन की भूमिका बताने लगे तब रोहित कुमार ने उन्हें टोका, ” ऐसा है श्रीधरजी ,आज केवल मुहुर्त कर लेते हैं….. वैसे भी कल से छ: दिन की डेट तो आपके पास है ही।” श्रीधर कुछ कहने के लिये मुँह खोलने ही वाले थे कि रोहित कुमार बोल पड़े, ”  सुपर फिल्मस्‌ वालों की पूरी फिल्म तैयार है I सिर्फ दो सीन का पैचवर्क निकला है। कल बहुत ही रिक्वेस्ट कर रहे थे वे लोग, प्रोड्यूसर तो कल दिन भर मेरे पीछे – पीछे दौड़ता रहा। मैंने आज शाम का टाइम उसे दे दिया।”
श्रीधर समझ गये । अब आगे कुछ बोलना बेकार था।” ठीक है” इतना कहकर उन्होंने अपने सहायकों को आवश्यक निर्देश देना शुरू किया I
रोहित कुमार का मेकअप मैन अफसर भाई अपने काम को निपटाकर सिगरेट पीने के लिए किसी कोने की तलाश करने लगा। सेट के एक कोने में जहाँ लाइट ,स्टैन्ड, ट्रैक ,कटर और लाल पीले नीले कागजों का ढ़ेर लगा था, एक कुर्सी पर लंबे बालों वाला एक गोरा नौजवान बड़े इत्मीनान से सिगरेट पी रहा है । अफसर को अपनी तलब मिटाने के लिए ऐसे ही जगह की तलाश थी। पास जाकर देखा तो विशाल बैठा हुआ है।
” अरे विशाल…. तू ?”
विशाल ने पलटकर देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
” अरे अफसर भाई। ये कंपनी भी पकड़ रखी है क्या?” ” नहीं विशाल…. अच्छा पहले एक सिगरेट निकाल।” अफसर ने अपना लक्ष्य साधा I विशाल ने गोल्ड फ्लैक का पैकेट सामने कर दिया Iहोठों में सिगरेट दबाकर विशाल की जलती सिगरेट से अपनी सिगरेट सुलगाई । एक ज़ोर का कश खींचकर धुंए को बाहर फेंका और बोला, ” कंपनी-वंपनी के मेकअप का चक्कर छोड़ दिया I बहुत मगज़मारी होती थी। अब रोहितजी के साथ हूँ। ” रोहितजी का नाम लेते हुये उसका सीना थोड़ा फुल गया। विशाल ने ऐसा मुँह बनाया जैसे उसे बहुत खुशी हुई, ” अरे वाह! लंबे रेस के घोड़े को पकड़ लिया। आज का सुपर स्टार । चलो अच्छा है।” ” और तू यहाँ कहाँ?” अफसर ने मुह से धुंआ निकाला।” एक्स्ट्रा सप्लायर रहमान भाई अपुन का दोस्त है ना, उसने मुहुर्त में        इनवाहट किया था। मैंने सोचा, चलो घूम आते है जरा।” विशाल ने लापरवाही से कहा।
“और सब कैसा चल रहा है?”
“बस दिन निकाल रहे हैं,  और क्या। अपनी सुना।”
“अपनी भी गाड़ी मजे में चल रही है ।” फिर कुछ सोचकर,
” शिखर कहाँ है? कई दिनों से मिला नहीं वो?”
” शिखर गाँव गया हुआ है…. करीब दो महिने हो गया।”
तब तक सेट पर मेकअप , मेकअप चिल्लाने की आवाज आयी। अफसर ने देखा कैमरा ट्रॉली पर लग चुका है और रोहितजी संवाद बोलने की रिहर्सल कर रहे हैं। तुरत फुरत में उसने अपनी सिगरेट बुझाई औा शुटींग स्पॉट की तरफ भागा ।
शॉट की सारी तैयारियां हो चुकी है। निर्माता जी .डी. शॉ की धर्मपत्नी के साथ आये वृद्ध संन्यासी ने मंगलाचरण के साथ कैमरे का पूजन शुरू किया I कैमरे के स्टैंन्ड में रोली टीका लगाकर हार पहनाया। उनके इशारा करने पर एक स्पॉट बॉय ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों के माथे पर टीका लगाना शुरु कर दिया। निर्देशक श्रीधर ने आनंद स्वामीजी के हाथ में क्लैप देते हुये उन्हें कुछ आवश्यक जानकारी दी Iआनंद स्वामीजी अच्छी तरह समझ गये कि उन्हें क्या करना है।
” प्लीज कीप साइलेंस” । श्रीधर के इतना चिल्लाने पर उनके तीनों सहायकों ने साइलेंस, साइलेंस का शोर करना शुरू कर दिया। उनके शोर को सुनकर सेट पर सन्नाटा छा गया । रोहित कुमार कैमरा फील्ड से बाहर खड़े हैं।
” फूल लाईट्‌स” श्रीधर के आदेश पर सारी बत्तियाँ एक साथ जल उठी।  “स्वामीजी।” श्रीधर ने ज़ोर की आवाज़ लगाई, ” आप थोड़ा बाये खड़े हो जाईये। जब मैं क्लैप कहूंगा तब आप क्लैप दिखाकर आराम से पीछे हट जाइयेगा। रोहितजी, आराम से इन्ट्रि करियेगा। ओके, रेडी फॉर टेक ।”
 “स्टार्ट साउंड” श्रीधर चिल्लाये।
” कैमरा” पाँच सेकेन्ड बाद साउंड रिकार्डिस्ट चिल्लाया l
कैमरा ऑन होते ही खर्रर्रर्र की आवाज़ होने लगी।
“स्वामीजी, क्लैप दिखाइए।” श्रीधर ने प्रार्थना की।
स्वामीजी ने दोनों हाथ से पकड़े क्लैप को कैमरे के सामने रखा और ” ॐ गं गणपतये नमः मुहुर्त शॉट फिल्म धुरंधर” कहकर मुस्कराने लगे। श्रीधर ने उन्हें इशारे से क्लैप बजाने के लिए कहा। इशारा देखकर उन्हें ध्यान आया कि क्लैप के ऊपर लगे लकड़ी की पटिया को उन्हें क्लैप पर हल्के से पीटना है । थोड़ी हड़बड़ाहट के साथ खट् की आवाज़ हुई। वे थोड़ा पीछे खड़े हो गये।
“एक्शन।” श्रीधर पुरी ताकत के साथ चिल्लाये। कहीं दूर नारियल के पटकने की आवाज़ सुनाई दी।
रोहितजी पर्दे के पीछे से कैमरा फ्रेम में आ गये। कैमरा ट्रॉली धीेरे से ट्रॅक पर चलने लगी। रोहित कुमार ने आवेश में आकर चिल्लाना शुरू किया।
” हॉ ,हॉ ,हॉ । धुरंधर हूँ मैं…. धुरंधर। हर फ़न में माहिर। हर खेल का खिलाड़ी। हर अन्याय का मुँहतोड़ जवाब दूंगा मैं ।  मेरे मंजिल की राह में आनेवाले हर पहाड़ को चूर -चूर कर दूंगा मैं । मौत का खौफ नहीं है मुझे। धुरंधर हूँ मैं…. धुरंधर।”
” कट कट” श्रीधर चिल्लाये।
कैमरे की खरखराहट बंद हो गई । तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कैमरों के फ्लैश धड़ाधड़ चमकने लगे। एक स्पॉट बॉय ने मिठाई का डिब्बा लाकर जी .डी. शॉ को दिया। उन्होंने डिब्बे में से एक मोतीचूर के लड्डू निकालकर स्वामीजी के मुँह में डाल दिया। मिसेज शॉ ने एक लड्डू रोहित कुमार के मुँह में डाल दिया। श्रीधर और शॉ ने एक दूसरे को लड्डू खिलाया। एक तश्तरी में नारियल के टुकड़े और शक्कर का प्रसाद युनिट के सभी मेम्बरों को बांटा जाने लगा। खाने की चीजें प्लेट में सजाकर स्पॉट बॉय यहाँ से वहाँ दौड़ने लगा।  कोल्ड्रिंक की बोतले खुलने लगी। एकदम उत्सव जैसा माहौल था। विशाल ने एक समोसा खाया और कोल्ड्रिंक की बोतल लेकर यहाँ से वहाँ घूमने लगा।
                                      ***
बांद्रा रेल्वे कालोनी के मैदान में बच्चें खेल रहे हैं। कोई बैट – बॉल तो कोई साईकिलI पूरा मैदान शोर में डूबा हुआ है। एक कोने में अशोक वृक्ष के नीचे चटाई बिछाकर स्वामी और बिहारी शतरंज की बाजियों में मस्त है। स्वामी को देखकर आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि वह दक्षिण भारत के किसी प्रांत का है। बंबई की फिल्म इंडस्ट्रि में वह ट्रंक बिछाने और ट्रॉली ढ़केलने का काम करता है। बिहारी अपने नाम के अनुरूप बिहार का है और एक नजर देखने में पता चलता है कि वह किसी न किसी कला का माहिर कलाकार है। घनी दाढ़ी जो सलीके से तराशी गई है। कानों तक लम्बें काले – सफेद बाल जो माथे के उपर काफी झड़ गए हैं जिससे उसके चेहरे की शोभा में कोई कमीं नहीं दिखती। चेहरे की बनावट और बात व्यवहार से बिहारी मैच्योर्ड लगता है। मोहरों के दाव-पेंच में उलझे स्वामी और बिहारी को पता है कि अब्दुल भाई पास में खड़े हैं लेकिन पारी खत्म होने के पहले कोई कुछ नहीं बोलता। अब्दुल भाई वक्त की नज़ाकत देखते हुए दो धुरंधर शतरंज खिलाड़ियों के खेल में मज़ा ले रहे। आखिर में बिहारी का राजा चारों तरफ से घीर जाता है। किसी भी तरह से स्वामी की जीत पक्की होने जा रही है Iबिहारी ने अपने हधियार रख दिये।
” बिहारी मियाँ, ये खेल बड़ी कुत्ती चीज है ।एक बार फँस गए तो समझो दीन दुनिया की कोई खबर नहीं।” अब्दुल मियाँ ऐसे हँसे जैसे कोई बहुत बड़ी बात कह दी हो। लाल – काली बत्तीसी नज़र आने लगी। स्वामी मोहरे बटोरकर कमरे में चला गया। ” अब्दुल मियाँ, दीन- दुनिया की छोड़ो, ये बताओ कोई फोन वोन कहीं से आया था ?” अब्दुल की दुकान पर ही इन लोगों के फोन मैसेज आते है।
” वो क्या कहते हैं,”  अब्दुल मियाँ ने दिमाग पर ज़ोर डालकर बोलना शुरू किया, ” जे .के. प्रोडक्शन से कल फोन आया था, शिखर मियाँ के लिए। मैंने कह दिया कि वो तो एक महिने के लिए अपने गाँव गये हैं।”
“फोन किसने किया था?” बिहारी झुंझलाया ।
” था कोई नौजवान। अपने को शिखर का दोस्त बता रहा था। बोला कि आज से शूटींग है। उनके लिए कोई रोल बता रहा था, मैंने बोल दिया वो है  नहीं अभी।” एक ही सांस में अब्दुल बोल गया।  ” नंबर – वंबर लिया कि नहीं आपने?” कुर्सी पर से बिहारी खड़ा हो गया। ” शिखर नहीं था इसलिए मैंने नहीं लिया।” अब्दुल मियाँ ने मुँह बनाते हुये कहा।
” अब्दुल मियाँ,” बिहारी ने अपनी दोनों कुहनी अब्दुल के कंधे पर रख दी, शिखर नहीं है तो क्या हुआ? नंबर आप ले लिये होते। अपना विशाल वहाँ चला जाता और बोल देता कि शिखर गाँव गया है। शिखर का दोस्त शिखर के दोस्त को भी काम दे सकता है न?” अब्दुल कुछ नहीं समझा। बिहारी ने समझाते हुये कहा, ” विशाल जाकर उससे मिलता तो वो रोल शायद उसे मिल जाता।”
” अब मुझे क्या पता था मियाँ?” अब्दुल ने होठ निकाली।
” तो अब पता कर लो अब्दुल मियाँ। कोई फोन आये तो डिटेल ले लिया करो।”
“अब ठीक है। और हाँ…. वो रश्मि मैडम का फोन कल शाम को आया था।” इस खबर के एक – एक शब्द को अब्दुल बहुत संभालकर बोला। रश्मि का नाम सुनते ही बिहारी कुछ – कुछ हरा हो गया, ” क्या बोली रश्मि मैडम?”
” बिहारी मियाँ, आज दुपहर के बारह बजे आपको घर पर फोन करने को बोली।”
” अच्छा! और कोई मैसेज?”
“बस! कल के लिए दो ही फोन थे।” अब्दुल दो कदम आगे बढ़ कर बिहारी के पास आ गया मानो अहम बात अब करने वाला हो। ” महिना होकर चार दिन बीत गये। तुम्हारा और विशाल मियाँ के अभी पाँच -पाँच सौ रूपये नहीं आये। स्वामी ने टाइम से दे दिया लेकिन वो शिखर मियाँ का पिछले दो महिने से बाकी है। कुल दो हजार रूपये निकलते हैं मेरे ।”
“दो – तीन दिन और रुक जाओ अब्दुल मियाँ। चार दिन बाद मेरी शुटींग है। सब दे देंगे। लेकिन अब्दुल मियाँ ,मैसेज एक जगह नोट कर लिया करो ।”
” मतलब?”
” मतलब यह कि छ:  फोन में से एक भी फोन का मैसेज कहीं बताना भूल गये तो हम लोगों का बहुत बड़ा लॉस हो सकता है।” बिहारी की इस शंका को सुनकर अब्दुल थोड़ा रोब में आ गया, ” ऐसा कभी नहीं हो सकता बिहारी मियाँ। मुझे पता है कि एक फोन की कितनी अहमियत है। ज्यादा फोन आते है तो लिख लेता हूँ। फिक्र मत करो।” अब्दुल ने दिलासा के साथ फिर अपनी बात कहने में कोई संकोच नहीं किया, ” दो- तीन दिन में पैसे का इंतजाम कर लो। मुझे भी जरूरत है।”
” एक दिन, मेरा मतलब पहले दिन की शुटींग हुई कि शाम को अपना और विशाल का पैसा दे दूंगा।”
” शिखर मियाँ का ।”
” जब शिखर मियाँ आयेंगे तो देंगे।ठीक है…. मैं चलूं। मुझे नहा- धोकर कहीं जाना है।” बिहारी ने अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की ।
” मुझे ही कौन-सा यहाँ दिन बिताना है। चलो, मैं भी निकलता हूँ।खुदा हाफिज । ” अब्दुल जिस राह आया था उस राह वापस लौट गया। बिहारी ने चैन की सांस ली और मैदान के बीचो- बीच फासला तय करके अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगा।
शिखर, स्वामी, विशाल और बिहारी चारों रूम पार्टनर के शुटींग के फोन अब्दुल मियाँ की दुकान पर  आते थे। कालोनी की गेट पर ही उसकी ब्रेड, अंडे, बटर जैसी चीजों को बेचने की दुकान थी। वह दिन भर फोन अटेंड करता। चारों रात में आकर अपना मैसेज कलेक्ट कर लेते या सुबह खुद अब्दुल आकर बता जाता। नाम के आगे “मियाँ” जोड़ना उसका तकिया कलाम था।
                                           ***
जीवन की सार्थकता की खोज में एक बार कोई उलझा, तो समझो कि उसके लिए…. जीवन एक संघर्ष है।     उद्देश्यपूर्ण जिंदगी जीने के लिए मनुष्य के सामने एक निश्चित लक्ष्य होना चाहिए….एक स्वप्न होना चाहिए। ” कुछ विषेश” कर दिखाने की हूक, भीड़ में ” अपनी एक अलग पहचान” बनाने की ललक उसे दिन रात बेचैन किये रहती है। लेकिन…. किसी भी महान लक्ष्य को प्राप्त करना बच्चों का खेल नहीं है। सफलता कोई चमत्कार नहीं जो पलक झपकते ही सिद्ध हो जायेगी। फिर भी, मनुष्य की जिंदगी में लक्ष्य का होना उतना ही आवश्यक है जितना आकर्षक, कर्णप्रिय सुगम संगीत में लय, ताल, आरोह एवं अवरोह की आवश्यकता होती है। यदि हाथी बिना सूंड का हो, नागराज के पास ज़हर नही, विशाल सागर में लहरों का उफान न हो, अग्नि में तपीश न हो…. तो क्या होगा ? इसी प्रकार यदि मनुष्य के जीवन में लक्ष्य न हो…. तो क्या होगा?
शिखर के जीवन का भी एक “लक्ष्य” है I नाम ,पैसा, शोहरत और उसके लिए जरूरी है अभिनय के शिखर पर अपनी सफलता का परचम लहराना। बंबई की फिल्म  नगरी में अपने आपको एक बेहतर ” अभिनेता” साबित करना। संघर्ष जारी है।
महानगरी एक्सप्रेस हवा को गति से बंबई की ओर भागती जा रही है। थ्री टायर कंपार्टमेन्ट के उपरवाली बर्थ पर लेटे – लेटे शिखर की कमर दुहरी होने के कारण हल्की हल्की पीड़ा हो रही थी। सिर पर दो पीले बल्ब के प्रकाश की वजह से वह ठीक से सो भी नहीं पा रहा था। उपर से पूरा पैर पसारने की कोई गुंजाइश नहीं। पीठ- पैर को आराम देने के लिए शिखर पेट के बल लेट गया। दिमाग में कोई विचार आते ही उसने पैंट की पिछली जेब से  पर्स निकाला। दुहरी तिहरी मुड़ी उस पर्स को शिखर ने धीरे से खोला।पर्स के बायी तरफ प्लास्टिक के फ्रेम में पूनम की पासपोर्ट साइज़ तस्वीर थी। पूर्णमासी की चाँद की तरह दमक रहा था पूनम का गोल सा मुखड़ा। दो महिने साथ में बिताये हुये  पूनम से पासपोर्ट साइज़ तस्वीर वाली पूनम कुछ ज्यादा ही सुंदर और आकर्षक लग रही थी। शिखर जानता था ऐसा क्यों….? ऎसा इसलिए की जो चिज बहुत ही करीब होती है  उसे पहचानने या समझने में हमारी बुद्धि उतनी सक्रिय नहीं रहती जितना की उस चिज के दूर हो जाने पर हमारी बुद्धि अप्रत्याशित रूप से कुछ अधिक तेज होकर उसके महत्त्व को समझने के लिए मजबूर करती है। पर्स के तहखाने में करीने से सौ – सौ रूपये के पाँच कड़क नोट बड़े सलीके से रखे गये थे। कितना ख्याल रखती है पूनम अपने प्रियतम शिखर का । नीचे बैठे यात्रियों का नज़र बचाकर शिखर ने उस पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर को अपने होठों से चूम लिया। कुछ समय के लिये उसकी सांसें तेज चलने  लगी। गाँव से बंबई के लिए विदा होते समय पूनम ने यह पर्स शिखर को भेंट किया था। दो महिने तक संग- संग रहने के बाद वह पूनम से कुछ लंबे समय के लिये दूर हो रहा था। अब उसे महसूस हो रहा था कि पूनम की गोदी में आँखे बंद करके पड़े रहने में जो सुख और तृप्ति का अनुभव होता था, उस अनुभूति के लिए अब वह तरस जायेगा। लेकिन अब वह कर भी क्या सकता था। बंबई जाना जरूरी है और पूनम के पास लौटना मुश्किल!! बंबई तो शिखर के लिए उसके सपनों की नगरी है जहाँ उसकी महत्वाकांक्षा को एक ठोस बुनियाद मिल सकती है। उसे बंबई जाना है और अपने नाम की तरह अभिनय के शिखर पर सफलता का परचम लहराना ही है। वह कुछ समय के लिये पूनम से दूर है, हमेशा के लिये तो नहीं। कुछ पाने के लिये कुछ खोना पड़ता है और कभी- कभी तो  “कुछ ज्यादा” ही खोना पड़ता है। पूनम की यादें इस वक्त “कुछ ज्यादा” ही खोने का आभास दे रही है।
शिखर उपर की बर्थ से उतरकर नीचे आ गया । नींद तो पूरी हो गई थी लेकिन आलस की खुमारी अब भी उसके चहरे पर थी। खिड़की से बाहर देखा तो लाल सूरज की सुनहली किरणें क्षितिज पर पसरी हुई
थी।
” कौन सा स्टेशन अभी गया भई?” शिखर ने सामने बैठे युवक से पूछा।
” इगतपुरी।” पच्चीस छब्बीस साल का इकहरे बदन वाले युवक ने अपनी आँखों को उपन्यास में गड़ा लिया।
” अब तो यहाँ से बंबई दो घंटे का रास्ता होगा।”
” हाँ, लेकिन तीन घंटे से पहले नहीं पहुँचेगी।” युवक ने शिखर को आश्वस्त करके अपनी आँखें फिर से उपन्यास में गड़ा ली।
शिखर को लगा जैसे उसने इस युवक को पहले कहीं देखा हो। उसने अपने दिमाग पर ज़ोर डालना शुरू किया कि उसने इस युवक के साथ एक हल्की सी मुलाकात कब और कहाँ हुई थी?
युवक उपन्यास पढ़ने में व्यस्त था। कुछ देर तक दिमाग पर ज़ोर डालने के बाद भी शिखर को कुछ याद नहीं आया।
” भाई साहब, क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि हम लोग पहले कहीं मिल चुके है?” शिखर ने अपनी शंका व्यक्त की।
” उउंउऽऽऽ,” शिखर को गौर से देखने के बाद युवक कुछ सेकेन्ड तक चुप रहा, फिर मुँह बिचकाते हुये अपनी असमर्थता जताई।
” हूँ हूँ ऽऽ ।” अब शिखर ने कुछ ज्यादा ही दिमाग पर जोर डालते हुये कहा, ” कहीं तो मिले हैं? क्या आप फिल्मों से संबंध रखते हैं।
शिखर के इतना कहने पर वह युवक मुस्करा पड़ा। उसने “हाँ” में अपना सिर हिलाया। शिखर समझ गया किये तो अपनी ही फिल्ड का आदमी है। उसने हाथ मिलाने के लिए अपना दाया हाथ बढ़ाते हुये परिचय दिया, “शिखर …. आर्टिस्ट हूँ।”
” अच्छा- अच्छा, वेरी गुड, ” कहते हुये उस युवक ने भी अपना दाया हाथ आगे बढ़ा दिया, ” मैं दयाशंकर मिश्र । एज़ ए राइटर, इस लाइन में हाथ पैर मार रहा हूँ।” उस युवक के इतना कहते ही शिखर की आँखें चमक उठी। वह उल्लास भरे स्वर में बोला,  ” याद आ गया मुझे। हम लोग ” वाह रे  जिंदगी” की शुटींग में मोहिनी विला में मिले थे।”
” करेक्ट। रमेश नंदानी की सिरियल  “वाह रे जिंदगी” मैंने ही लिखी है।”
” वही तो मैं कब से सोच रहा हूँ कि हम लोग कहीं न कहीं मिले हैं। वैसे भी काफी अरसा हो गया उसकी शूटींग को।” पहली मुलाकात का पूरा दृश्य शिखर के आँखों में सजीव हो उठा था।
“हाँ, आज से एक साल पहले चार एपिसोड पायलट शूट किये थे। तब से अप्रुवल के इंतजार में पड़ा हुआ है।” दयाशंकर के बोलने में थोड़ी सी निराशा झलकी ।
” उस सिरियल में मैं एक क्रिमिनल बना हुआ था।”
” जब हम मिले थे तब आप शायद दाढ़ी- मूँछ के गेटअप में थे। इसलिए एक झटके में आज आपको पहचानने में देर हो गई। वैसे मानना पड़ेगा आपकी याददाश्त को। ” दयाशंकर मिश्र ने शिखर की तारीफ की। इसके बाद वही हुआ जो दो आदमी जब एक ही क्षेत्र के मिलते है तो अपनी अपनी रामकहानी सुनाते हैं। संपर्क कायम रखने के लिए टेलिफोन नंबर और पता का आदान प्रदान हुआ। एक दूसरे के प्रति शुभकामनाए व्यक्त की गई। बात बात में पता चला कि लेखक दयाशंकर मिश्र विक्रोली में  अपने जीजा जीजी के साथ रहते हैं और वहीं टैगोर नगर के एक प्राइवेट स्कूल में हिन्दी और इतिहास के अध्यापक है। साहित्य प्रेम, लेखन रूचि एवं अध्ययन का गहरा चस्का होने के कारण दयाशंकर मिश्र ने रामधारी सिंह “दिनकर” , शकील बदायुनी, कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” , मगरूह सुल्तानपुरी, कवि पंडित प्रदीप की तरह एक साहित्यिक नामकरण भी कर लिया था। हिन्दी और इतिहास के अध्यापक दयाशंकर मिश्र जब निर्माता- निर्देशकों से मिलते तो कहते  “मैं…. निरंजन पागल …. मेरे पास आज की रनिंग फिल्मों से कुछ हटकर कहानी है।”
महानगरी एक्सप्रेस बंबई महानगर के सीमा में प्रवेश कर चुकी है।
                                            ***
बंबई की माया को कोई समझ नहीं पाया। माया नगरी है यह  माया की नगरी….जो सबको अपने भ्रमजाल में फंसाये हुई है…. और इसी नगरी में जादू की कोठरी भी है। इस कोठरी में कोई प्रवेश द्वार नहीं बना है इसलिए इसमें प्रवेश से पहले काफी भटकना पड़ता हैा भटकने के बाद कोई न कोई अदृश्य सुराख मिल ही जाता है जहाँ बड़ी मशकत के बाद कोठरी में घुसा जा सकता है। बाहर से कोठरी और अंदर से एक विशाल दुनिया। इस दुनिया के सारे वाशिंदे आसमान को चूमने के लिए कूदते- फांदते रहते है। किसी शक्ति के द्वारा यहाँ के लोगों की भावनाओं का संचालन होता रहता है। मृगतृष्णा जैसी प्यास है सबको। कस्तूरी की सुगंध से बावले रहते हैं यहाँ के लोग। शबनम की बूंदों को चाटकर तृप्ति का अनुभव करते हैं। असीम आनंद प्रदान करने वाली अनुभूति । मायावी तिलस्मों की कोठरी है यह फिल्म नगरी।
                                       ***
दस बाई दस की कोठरी। एक कोने में थोड़ी जगह में रसोई तो दूसरे कोने में एक छोटी सी मोरी। दो बाई तीन की एक जालीदार खिड़की जिससे होकर रोशनी, हवा और धूल- धुआँ आती जाती रहती है। दिवारों पर जहाँ तहाँ उखड़ी हुई सिमेंट की पलस्तर । एक कोने में कील के सहारे लटकी हुई फुट्टापार्थी के सत्य साईबाबा की तस्वीर । दो पल्लों की बहुत पुरानी किवाड़ जिसके सांकल हवा के झोकों के साथ बजने लगते हैं। किवाड़ के पीछे एक पल्ले पर हाथ में शराब की बोतल लिये झूमते अमिताभ बच्चन की तस्वीर है तो दूसरे पल्ले के पीछे सागर के किनारे टू पीस बिकनी पहने उत्तेजित मुद्रा में ममता कुलकर्णी की तस्वीर । फर्श पर एक दरी और एक चटाई बिछी हुई है जिसपर चार लोग लेटे पड़े है…. वो भी बड़ी मुश्किल से। मरने के बाद एक आदमी को जितनी जमीन चाहिये, जीते जी उससे भी कम जमीन पर पसरे ये चार नौजवान अपने सुनहरे भविष्य के सपने संजो रहे हैं। “और शिखर …. वहाँ गाँव में सब कैसे है ?” बिहारी ने उंघते हुए पूछा।
” सब ठीक है। मजे में है।” कहते हुये शिखर उठ बैठा, “अरे स्वामी, तू भी तो गाँव जाने वाला था? गया नहीं?”
” जाने का तो सोचा था…. लेकिन अब बाद में जायेगा |” टूटी- फूटी मद्रासी टोन वाली हिन्दी में स्वामी ने कहा।
” साउथ से मद्रासी और नार्थ से बिहारी, इन्होंने जबान खोली कि पता चल जाता है कि भाई साहब रजनीकांत के गाँववाले है या शत्रुघ्न सिन्हा के पटना वाले बाबू ।” कहता हुआ विशाल हँसने लगा। ” तो इसमें प्रॉबलम क्या है।” स्वामी ने प्रतिवाद किया, “हम रजनीकांत के गाँववाला है तो इसमें बुरा क्या है! है कि नहीं बिहारी जी?”
” ये सुबह- सुबह जात-धर्म का झगड़ा छोड़ो I” बिहारी झुंझला गया।
“मैं….अब्दुल मियाँ के यहाँ दूध लाने जा रहा हूँ और स्वामी, तू चल चाय बना।” शिखर कमरे के बाहर चला गया I
” ये शिखर तो गाँव जाकर मोटा हो गया विशाल भाई ।”
“मोटा तो होगा ही। वहाँ पर कौन सा इसको स्ट्रगल करना था।” विशाल ने कंधा उचकाते हुये बोला,  ” देखना, दो महिने में फिर जैसे का तैसा हो जायेगा।”  उसने अपना सर जो़र से दबाया।
“सिर में दर्द है क्या? बिहारी ने अपनापन जताते हुये बोला।
” रेल्वे लाइन के नजदीक की झोपड़ी में तो रहना ही नहीं चाहिए। रात भर वही चिल्ल-पो। नींद नहीं पूरी होती।” विशाल ने कहा।
“तो क्या करूं? बोल। वो जुहू में हिंदुजा वाला बंगला खरीद लूं क्या?” मजाक करते हुये बिहारी हँस पड़ा।
” इसमें हँसने की क्या बात है। एक दिन देखना, विशाल जी का भी फ्लैट होगा जुहू में।” स्वामी से चुप नहीं रहा गया।
“फिरोज भाई जैसी अपनी तकदीर कहाँ यार ? विशाल अतीत की यादों में खो गया,  “फिरोज ने भी इसी कमरे में छ: साल झख मारी। जुहू में नहीं तो क्या हुआ, कम से कम मीरा रोड में तो उसका अपना फ्लैट हो गया न?”
” हम सबका अपना – अपना घर होगा।” दूथ लेकर शिखर आते ही बोला, “बहुत ही लकी रूम है यह। विशाल, मैं जब से तेरे साथ इस रूम में रहने आया, मैं सुखी हूँ क्योंकि कुछ न कुछ थोड़ा बहुत तो काम मिलता ही रहता है। पहले  जहाँ पर था, वहाँ छ: महिने में एक दिन भी शूटींग का खाना नसीब नहीं हुआ था।”
शिखर की बात सुनकर हँसने लगे। बिहारी उठा और मुँह धोने लगा क्योंकि उसे नौ बजे तक डबिंग करवाने के लिए सुदीप रिकार्डिंग स्टुडियो पहुँचना था। स्वामी की दो बजे की शिफ्ट थी। विशाल को किसी से मिलने जाना था और शिखर जुहू बस डिपो ताकि यह पता चल सके कि कहाँ- कहाँ किसकी शूटींग हो रही है, किस- किस निर्देशक ने अपनी नई फिल्म शुरू की।
किसी ने आटा गुंथना शुरू किया तो किसी ने सब्जी काटना। स्वामी ने रात के जूठे बर्तनों को धो डाला और नहा धोकर सत्य साईबाबा की पूजा में बैठ गया। एक घंटे के भीतर रोटी- सब्जी तैयार। कटोरी में सब्जी और अखबार पर रोटी रखकर सबने एक साथ भोजन किया। एक के बाद एक; इस तरह चारों कोठरी से निकलकर बंबई की भीड़ में खो गये। कुछ पाना है तो बहुत कुछ खोना है, कभी कभी अपने आपको भी।
बड़ी अजीब है यह बंबई की फिल्मनगरी। अगर इस जादुई नगरी को पल भर के लिए बंबई से निकालकर बाहर कर दें तो इस शहर का “चार्म” ही खत्म हो जायेगा। कितनी बेजान और निरस हो जायेगी यह बबई।अब्दुल मियाँ की दुकान में रखे पुराने रेडियो में डॉन फिल्म का गाना बज रहा है- ई है बंबई नगरियां तू देख बबूआ, बबई नगरियां में माया की डगरियां तू देख बबुआ। ई है, ई है बंबई नगरियां तू देख बबूआ।
                                             ***
अंधेरी स्टेशन। चर्चगेट से आनेवाली धीमी लोकल में जबरदस्त भीड़ है। उतरने- चढ़ने वालों की धक्का मुक्की में पसीने से तर बतर बिहारी किसी तरह प्लेटफार्म पर उतरता है। भीड़ की ठेलम ठेल से  निकलकर वह बाहर टिकट खिड़की पर आकर खुली हवा में सांस लेने के बाद रूमाल से अपनी गर्दन और चेहरे को पोछता है। बड़े सलीके से अपने बालों को संवारने के बाद वह दाढ़ी और मूँछ पर भी कंघी फेरता है। बिहारी जिस स्थान पर खड़ा है वह स्थान फिल्मी लोगों के लिये एक मिटींग स्पॉट जैसा है। फिल्मों के वो लोग जो छोटी -बड़ी होटलों में मिलकर विचार विमर्श करने की हैसियत नहीं रखते, ऐसे लोग अक्सर यहीं इसी स्थान पर मिलने का वादा करते हैं। मेल- मिलाप करने के बाद यदि जरूरी हुआ तो सामने इरानी के रेस्तरां में जाकर पुडिंग और चाय का नाश्ता भी कर लिया जाता है।
बोरीबली से ग्यारह बीस की लोकल आकर जा चुकी थी लेकिन रश्मि का अभी तक कोई पता नहीं । किसी के इंतजार में खड़े रहना बिहारी को बहुत खलता था। स्टेशन से बाहर निकलने वाली हर लड़की को वह ऐसा घूरता  जैसे रश्मि ही आ रही हो। सिगरेट की तलब उसे सताने लगी। शर्ट की जेब को थोड़ा टटोला तो मानिकचंद की पुड़िया में थोड़ा सा मसाला बचा था। बचा खुचा गुटखा मुँह के हवाले किया और पान की दुकान की तरफ बढ़ चला। ब्रिस्टाल सिगरेट अभी सुलगाया ही था कि पीछे से किसी के  “हैलो सर” कहने की आवाज आयी। पीछे मुड़ा तो देखा शशांक खड़ा है।
“अरे शशांक, यहां कहां?”
” दो बजे की शिफ्ट है, फिल्म सिटी जा रहा हूँ।”
” क्या कर क्या रहे हो?”
” एक्स टीवी का डेली सोप है “खुदगर्ज” । कॉलेज स्टुडेन्ट का कैरेक्टर कर रहा हूँ।”
” गुड ,वेरी गुड l लगे रहो।” बिहारी ने हौसला बढ़ाया।
“सर। कभी आपने मुझे याद नहीं किया। कोई दमदार कैरेक्टर हो तो मुझे भी काम करने का मौका दीजिये।” शशांक का चेहरा विनम्र हो आया I
” ऐसा कुछ निकला तो जरूर बुलाऊंगा शशांक ।” बिहारी ने विश्वास दिलाने के लिए उसके कंधे को थपथपाया।
“सर। कहीं कुछ नया शुरू हो रहा है?”
बिहारी ने कुछ सोचने की मुद्रा में आँखे बंद की और एक दमदार कश खींचा। शशांक उसका मुँह बडे़ गौर से देखने लगा। बिहारी ने आँखे खोली और बिना धुए को फूंके उसने बोलना शुरू किया, “फिल्म सिटी तो जा ही रहे हो वहीं फरिस्ते मैदान में  ” अपनी- अपनी रामकहानी” का सेट लगा हुआ है। वहाँ प्रोडक्शन मैनेजर सुरेश पिल्ले हैं। उनसे मिलकर बोलना की तुझे मैंने भेजा हैं।
” थैंक्यू सर।” शशांक ने कृतज्ञ होकर सिर झुकाया।
शशांक के जाने के बाद बिहारी मन ही मन बुदबुदाया,  ” क्या बात है कि रश्मि अभी तक नहीं आयी?” एक जोर का कश खींचते हुये बिहारी टेलीफोन बुथ की ओर बढ़ गया। फोन करने के लिये उसने जैसे ही रिसिवर उठाया तो सामने देखा रश्मि आ रही है।
साढ़े पाँच फीट कद, आकर्षक फिगर, गोल मासूम सा चेहरा, गुलाबी गाल, चमकदार कत्थई आँखे, बिखरे हुये रेशमी बाल, चुस्त नीली जींस, ढ़ीला गुलाबी टी शर्ट, काली उँची सैंडल….
रश्मि सचमुच अपने चमक को बिखेर रही थी। पता नहीं क्यो एकबारगी रश्मि को देखने के बाद बिहारी का दिल बैठने लगता था फिर धीरे – धीरे सब कुछ नार्मल हो जाता था। कुछ कुछ ऎसा ही अभी अभी बिहारी के साथ हुआ
” हाय” कितनी मनभावन आवाज है रश्मि की?
” आई एम सॉरी। आज मैं फिर लेट हो गई।” कितनी मासूम है रश्मि ।
“गलती हो गई बाबा । नाराज क्यों होते हो?” तुमसे नाराज होकर कोई जी पायेगा।
” तुम बोलते क्यों नहीं?”
” मैं क्या बोलूं? पूरे सवा घंटे से उल्लूयों की तरह सिर उचकाय
देख रहा हूँ…. और आप है कि…. बस I”
” क्या करती गोरेगाँव में ट्रेन आधे घंटे खड़ी रही।”
” चलो छोड़ो सारे फोटोग्राफ्स ले आयी?”
” हां”
” मिस बंबई कॉन्टेस्ट वाली भी….?”
” हाँ हाँ , वो भी लायी हूँ।”
” तो चलो, नटराज भी तो पहुँचना है।”
दोनों एक रिक्शे में बैठ गये Iरिक्शा नटराज स्टुडियों की ओर दौड़ पड़ा।
” हैैरी बहुत अच्छा ऍडमेकर है।” नटराज स्टुडियों में मिलने वाले शक्स के बारे में बिहारी बताने लगा,  ” महिने दो महिने में एक न एक डीलक्स प्रोडक्ट के लिए ऍड बनाता रहता है।”
” आपने हैरी को मेरे बारे में बताया ।” रश्मि ने ऐसे ही पूछ लिया।
” हां हां बताया। मैंने उसे बताया कि स्वर्ग की एक सुंदर अप्सरा से उसे मिलवाने वाला हूँ।”  बिहारी के इतना कहने पर रश्मि ने बनावटी गुस्से में उसकी नाक खींच ली। बिहारी नाक छुड़ाने के लिए जोर – जोर से हांफने लगा। इन दोनों की मस्ती देखकर रिक्शा ड्राइवर भी मंद – मंद मुस्कराने लगा। बिहारी की नाक किसी तरह रश्मि के चंगुल से छुटी तो उसने कसम खाने के अंदाज में बोलना शुरू किया,   ” सच कहता हूँ रश्मि । देखना वो दिन आयेगा जब तुम टॉप पर पहुँचोगी। एकदम टॉप की सुपर स्टारनी।”
” खींचो खींचो ” रश्मि ने मुँह फुलाते हुये कहा , “जितना खींचना है मेरी टेर खींचो ।”
बिहारी जान गया कि रश्मि अब थोड़ी गंभीर हो गई। उसने मूड हल्का करने के लिए कहा,  ” मैं मज़ाक नहीं कर हूँ रश्मि । एक नेचुरल अट्रैक्शन जो किसी हिरोइन के चहरे पर होना चाहिए, वो तुम्हारे चेहरे पर है।”  बिहारी बड़ी संजीदगी के साथ रश्मि की तारीफ करने लगा,  ” तुम्हारी कत्थई आँखे बहुत ही मासूम लगती हैं। फेस और फिगर में तुम्हें कोई माइनस नहीं कर सकता रश्मिI रियली, यू आर वेरी ब्यूटीफूल।”
” बस बस रहने भी दो, नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगी।” रश्मि खिलखिलाकर हँस पड़ी, ” मेरी ये खूबसूरती, मेरा टेलेन्ट तब तक किसी काम का नहीं जब तक मेरी पहचान नहीं बन जाती।”
रिक्शा नटराज स्टुडियो पहुँचा तो पता चला कि युनिट का लंच ब्रेक हो गया। स्पॉट बॉय ने बताया कि हैरी प्राश मेकअप रूम में लंच कर रहे हैं। बिहारी को मिलने – मिलाने का यह मौका ठीक लगा। वह रश्मि को लेकर मेकअप रूम की तरफ बढ़ गया l बिहारी ने प्लायवुड के दरवाजे पर हल्की सी नॉक की।
” कम इन”
बिहारी और रश्मि वातानुकूलित मेकअप रूम में घुस गये।
” गुड आफ्टर नून हैरी साहब।” बिहारी ने रूम में घुसते ही कहा।
” आओ बिहारी आओ” कहते हुए हैरी की नज़र रश्मि पर रूक गई।
रश्मि ने  ” हैलो सर” कहते हुये हाथ जोड़े।
हैरी प्राश ने मुस्कराकर अभिवादन स्वीकार करते हुये बैठने का इशारा किया। बिहारी तो हैरी के सामने पड़े सोफे पर पसर गया और रश्मि आदमकद शीशे के सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गई । हैरी ने दिवार पर लगी एक बटन दबाई। स्पॉट बॉय तुरंत उपस्थित हो गया। ” राजू दो टिफिन ले आना।”
” नहीं नहीं। इसकी जरूरत नहीं हैं। हमलोग खाना खाकर आये है।” बिहारी ने झूठ बोला क्योंकि हैरी खा चुका था और बिहारी खाने-पीने के झंझट में पड़ना नहीं चाहता था।
हैरी ने रश्मि की तरफ देखा। उसने भी खाने की अनिच्छा दर्शायी।
” ठीक है, मुसंबी का ज्यूस लेकर आना।” स्पॉट बॉय चला गया।
” हैरी साहब, मैं इन्हीं की बात कर रहा था आपसे।रश्मि, अपना अलबम दिखाना जरा।” बिहारी बहुत ही उत्साहित हो रहा था। रश्मि ने अपना अलबम हैरी को थमा दिया। वह अलबम के एक एक फोटोग्राफ को बड़े गौर के साथ देखने लगा। रश्मि की नज़र जब आदमकद शीशे में अपनी प्रतिबिम्ब पर पड़ी तो वह एकदम से चौक गई । “अरे , यह कौन है? हूंऽऽऽ ये रश्मि है। इतनी खूबसूरत!!!” उसे लगा कि, बिहारी सच ही बोल रहा था । वह सचमुच स्वर्ग की अप्सरा जैसी खूबसूरत है। उसकी कत्थई आँखों में कितनी मासूमियत झलक रही है। नेचुरल अट्रैक्शन भी तो हैं चेहरे पर। वह जरूर बनेगी। एक न एक दिन Iटॉप की स्टारिन |
स्पॉट बॉय तीन गिलास में मुसंबी का ज्यूस लेकर आ गया। रश्मि की तंद्रा टूट गई। बिहारी और हैरी ज्यूस की चुस्की के साथ रश्मि की हसीन अदाओं को फोटोग्राफ्स में निहार रहे है, लेकिन ज्यूस के गिलास को लेकर रश्मि थोड़ा असमंजस में है क्योंकि गिलास को होठों पर लगाने से लिपस्टिक के फीका होने का डर था। हैरी के एक्सीलेंट, वेरी नाइस, सुपर्ब, ब्यूटीफूल कमेन्ट सुनकर रश्मि के मन में गुदगुदी होने लगी। हैरी के आग्रह करने पर उसने ज्यूस को अपने मुँह से लगा लिया। अलबम के सभी फोटो देखने के बाद हैरी ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला कि प्लायवुड के दरवाजे पर दस्तक हुई।
” कम इन”
पतली गोरी नाज़ुक सी सोलह साल की कन्या ने दरवाजा खोलकर अंदर प्रवेश किया। उसने बैंगनी कलर का चुस्त स्लैक्स पहन रखा था। शरीर के उभार को छिपाने के उद्देश्य से उसने एक सफेद मुलायम रोयेदार टॉवल से अपना उपरी भाग ढ़क रखा था। वह मुस्कराती हुई बिहारी के सोफे पर थोड़ी दूर बैठ गई।
” रश्मि , इनसे मिलना । ये है शालू | मेरे इस एरोबिक प्रोडक्ट की मॉडल। और शालू, ये है रश्मि ।” हैरी के परिचय पर दोनों ने एक दूसरे को “हैलो” कहा। बिहारी से नज़र मिलने पर उसने अपना दाया हाथ आगे बढ़ा दिया। शालू ने भी अपना दाया हाथ बढ़ाकर बिहारी से हाथ मिलाया। इस दौरान टॉवल कंधे से सरक कर नीचे खिसक गई। शालू का कसा हुआ शरीर देख बिहारी के शरीर में कंपकपी दौड़ गई।
” अच्छा रश्मिजी,  ” हैरी ने रश्मि की ओर देखा, ” मेरे पास एक – दो प्रॉडक्ट के प्रोजेक्ट हैं जो मैं अगले महिने शूट करने वाला हूँ। अगले सोमवार मुझे फोन करना तब तक मेरा प्लान कन्फर्म हो जायेगा।”  हैरी के अलबम लौटाने पर रश्मि ने पूछा, “सर, आपने कोई फोटो नहीं ली।”
“फोटो की तो कोई जरूरत नहीं है। मंडे को तो मिल ही रहे हैं।” हैरी ने बेफ्रिकी से कहा।
” वैसे भी फोटो उनके लिये जाते हैं जिनको काम नहीं देना होता।” बिहारी से नहीं रहा गया।
” नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है। शालू को तो मैंने फोटो देखकर सिलेक्ट किया था।” हैरी ने बिहारी की बात काट दी।
” आप पारखी है , हैरी साहब।” बिहारी की तारीफ पर हैरी ने मुस्करा दिया।
” अच्छा अब चलें।” रश्मि को लगा अब बैठने का कोई मतलब नहीं।
” ठीक है रश्मि। कीप इन टच |” कहते हुये हैरी ने अपना दाया हाथ आगे बढ़ा दिया। रश्मि ने अभिवादन स्वीकार किया। शालू से बाय – बाय हुआ और दोनों मेकअप रूम से बाहर निकल पड़े। दरवाजा अपने आप बंद हो गया। अंदर केवले हैरी प्राश और शालू रह गये । नटराज स्टुडियों से रिक्शा पकड़कर वे अंधेरी स्टेशन आये।
” हैरी को कब से जानते हैं आप ?” रश्मि ने पूछा।
बिहारी ने अपने होठों को सिकोड़ लिया। रश्मि ने दुबारा यही प्रश्न किया तो उसने मुँह बिचकाते हुये कहा, ” अपनी – अपनी तकदीर की बात है रश्मि। कभी मैं और हैरी आनंद मुखर्जी के असिस्टैन्ट हुआ करते थे। लेकिन…. वक्त – वक्त की बात है….आज वो डिरेक्टर बन गया और मैं अभी तक….।” बिहारी को लगा कि वह अब आगे नहीं बोल पायेगा। रश्मि उसके दर्द को समझ गई। उसने उसकी दुखती रग को छेड़कर अच्छा नहीं किया।  बिहारी को नार्मल करने के लिए रश्मि ने उसकी हथेली पर अपनी हथेली को रख दिया, ” आप ही तो कहते थे , कि हर चिज़ का एक वक्त होता है। शायद अब आपका  वक्त आने वाला हो।” बिहारी की हथेली पसीज गई। रश्मि के आग्रह पर बिहारी उसके साथ होटल प्रसादम में गया। मसाला डोसा का बिल चुकाने के बाद रश्मि ने पाँच सौ रूपये का नोट बिहारी की जेब में डाल दिया। उसने कोई ना नुकुर नहीं की। वास्तव में उन दोनों के बीच यह नियमित लेन-देन था जिसमें बिहारी सिर्फ लिया करता था और रश्मि सिर्फ दिया करती थी। इस लेन- देन के बदले बिहारी उसे लोगों से मिलने – मिलाने और रोल के लिए जोड़-तोड़ में मदद करता था। इसके बदले में स्नेह वश रश्मि बिहारी की आर्थिक मदद किया करती थी। फिर मिलने के वादे के साथ दोनों अपने -अपने बसेरे की ओर लौट पड़े।
     **************************
भारतीय फिल्म के पितामह दादासाहेब फाल्के फिल्म” राजा हरिश्चंद्र” में तारामती का रोल सालुंके नामक पुरुष ने किया था क्योंकि उस समय कोई स्त्री फिल्म में काम करने को तैयार नहीं थी। दादासाहेब फाल्के ने मजबूर होकर एक पुरूष को नारी वेशभूषा में सजाकर तारामती का अभिनय करवाया । यह हिन्दुस्तान की पहली फिल्म का जन्मोत्सव था जिसने आज चौरासी वर्ष का सफ़र तय करके अपना अविस्मरणीय इतिहास बना लिया । रश्मि की तरह एक नहीं बल्कि हजारों लड़कियां बंबई एवं मद्रास की सड़कों पर रातोंरात इस मायानगरी की मल्लिका बनने के लए बेताब है।
                                             ***
कमालिस्तान स्टुडियो । पौने दो बजे दोपहर का समय । लंच ब्रेक हो चुका है। पुरी युनिट खाना खाने के लिये यहाँ-वहाँ खड़े -बैठ इंतजार कर रही है। बड़े बड़े बर्तनों में राइस, दाल, चपाती, सलाद, रायता और चिकेन करी रखा हुआ है। अलग -अलग डिपार्टमेन्ट के लिये टिफिन तैयार हो रहा है। प्रोडक्शन मैनेजर देशपांडे लंच सप्लायर मोहम्मद उस्मान को डांट रहा है,  ” कमाल है यार।तुझे इंडस्ट्रि में कितने साल हो गये ? तुझे लंच टाइम पता नहीं है?
” देशपांडे ,अब चकाला में इतना ट्रैफिक था कि लेट हो गये।”
” चल चुप कर।” देशपांडे ने आँखे तरेरी,  ” ट्रैफिक का बहाना मार दिया, बस तेरा काम हो गया और यहाँ डायरेक्टर मेरा कब से कपड़े फाड़ रहा  है।” दाल परोसते- परोसते एक नौकर के हाथ से कलछुल दाल के बड़े बरतन में गिरकर डूब जाती है। ” सब के सब थकेले है क्या मोहम्मद, देर में दे कर रहा है ये स्साला।” देशपांडे की खीझ देखकर मोहम्मद ने बनावटी गुस्से में उस नौकर को डांटा। तब तक सहायक निर्देशक नागेश कुमार ने आकर देशपांडे से डायरेक्शन डिपार्टमेंट के लंच के बारे में पूछा I  “अब जाकर अपने डायरेक्टर से बोल दे कि ये इंडिया है इंडिया, हॉलीवुड नहीं  कि डेढ़ बज गया और खाना आ गया सामने”  देशपांडे के गुस्से को देखकर सहायक निर्देशक नागेश सहम सा गया। लंच में अब कुछ ज्यादा ही देरी हो रही है। लेकिन देशपांडे हुक्म चलाने के अलावा और कर ही क्या सकता है। तसले में चिकन करी देखकर  जैसे उसे कुछ याद आया,  ” अरे मोहम्मद, सुन।” मोहम्मद पास आ गया तो देशपांडे ने अपना मुँह उसके कान के पास ले जाकर बोला,  ” चिकेन करी केवल डायरेक्शन, कैमरा, प्रोडक्शन डिपार्टमेंट और आर्टिस्टो को ही देना। बाकी किसी को नहीं। क्या समझे?” मोहम्मद समझ गया।
लाईट, द्रैक, ट्रॉली वाले मजदूर लाइन लगाकर अपनी -अपनी थाली में लंच ले रहे हैं। बात कहीं फूट गई थी। इसलिए आपस में कानाफूसी हो रही थी।
” ये स्साला देशपांडे जबरदस्त झोल करता है। अब देख न, पूरे सत्तर आदमी की युनिट का लंच बिल बनायेगा और चिकन करी केवल सतरह आदमी ही खायेंगे।” रफीक लाइट मैन ने रघु से कहा। रघु के मन में कड़वाहट थी,  ” हर खर्चे में स्साले का कमीशन बंधा रहता है। कितना भी कमीशन बना ले, रात को सब दारू और रांड के पीछे खत्म।”  थोड़ी दूर बैठा कैमरा अटेन्टेन्ट नंदू भी भला चुप क्यों बैठता ,  ” पीछे कितना भी लात मार लो, चलता है लेकिन आगे पेट पर लात नहीं मारना चाहिये। अब सारा खर्चा प्रोड्यूसर कर रहा है और देशपांडे अपनी ही पॉलिसी लगा रहा है । ऊपरवाला माफ नहीं करेगा।
सेट पर लगाये सोफे पर बैठकर फिल्म निर्देशक सतीश शर्मा और कैमरामैन राजन नायर चिकन करी का मज़ा लूट रहे हैं। दोनों के सहायक भी लंच करने में व्यस्त हैं। स्पॉट बॉय लल्ली सबको मनपसंद चीजे परोस रहा है।
” अबे लल्ली।”
“हां सर। क्या दूँ आपको?”
“नहीं ,नहीं। कुछ नहीं चाहिए मुझे।” मुँह के कौर को निगलते हुये सतीश शर्मा डांटना शुरू किया, मैंने तुझे कई बार समझाया कि जहाँ डायरेक्शन और कैमरामैन के लोगों का  टेबल लगे, वहाँ  युनिट का कोई तीसरा  आकर खाना नहीं लेगा।”
” सर ।आज तो कोई नहीं आया न?”लल्ली ने विश्वास के साथ कहा।
” अबे चुप कर। वो मेकअप मैन बेवड़ा आकर खाना निकाल रहा था।” फिर कैमरामैन को बताने के लिए सतीश शर्मा ने कहा,  ” वो स्साला कहीं और नहीं , बस यहीं आयेगा। उसके  थोबड़े को देखकर मुझे घिन्न होती है। कई बार समझया कि…..।”
“सर, वो कब आया मुझे मालूम नहीं। मेकअप, ड्रेस और सेटिंग वालो का अरेजमेंट अलग से किया हुआ है” लल्ली ने सफाई दी
” जब तू पानी लाने गया था न, तबी वो आया और चुपचाप चिकन करी अपनी थाली में डालकर चलता बना।” उम्र के हिसाब से नागेश कुमार स्पॉट बॉय से छोटा था लेकिन उसका ओहदा उससे बड़ा था।
” चल छोड़ नेक्स्ट टाइम ध्यान देना।”  सतीश शर्मा ने स्पॉट बॉय को आदेश दिया, ” चल जरा चिकन करी दे, और एक थम्स अप लेकर आ।” स्पॉट बॉय ने चिकन करी परोसी और थम्स अप लाने चला गया।
” अरे नागेश। पार्टी वाला सीन अभी करेंगे और श्मशान घाट वाला शाम को करना है।”  सतीश शर्मा ने अपने सहायक को जानकारी देना जरूरी समझा।
” ठीक है सर। प्रापर्टी सब तैयार है।” नागेश ने भी अपनी होशियारी दिखाई।
” कौन- कौन सी प्रापर्टी?”
” पचास किलो लकड़ी, दस लीटर पेट्रोल, सेटींग वाले अभी दो अर्थी बनाने वाले हैं। लोहबान के लिए मैंने मैनेजर से बोल दिया है।”  नागेश एक ही सांस में सब कुछ कह गया।
” और पचास लोगों की क्राउड?”   सतीश शर्मा ने पूछा।
” वो तो देशपांडे जी बुलाये होंगे न?” नागेश ने अनभिज्ञता जाहिर की।
” अबे मूर्ख । देशपांडे से जाकर पहले कन्फर्म कर… मुझे सात बजे की शिफ्ट में सब के सब चाहिये।” सतीश शर्मा का आदेश सुनकर नागेश कुमार देशपांडे को ढूंढ़ने के लिये निकल पड़ा l अपने जूठे हाथ वह बाहर ही धोयेगा। ” बहुत ही सिन्सियर और शार्प माइंड का लड़का है यह नागेश,  ” सतीश शर्मा राजन से बोल रहे थे, ” क्लैप और कन्टिन्यूटी मेन्टेन करना अच्छी तरह से जान गया है यह । अब इसे मैं और कामों में एक्सपर्ट कर रहा हूँ।” सतीश शर्मा ने हाथ- मुँह धोने के बाद इस्माइल को बुलावाया।
” तुम्हारे चीफ असिस्टैन्ट बिहारी साहब कहाँ गये हैं? ” शर्मा ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा।
” सर…. वो तो पान खाने गये है।” इस्माइल ने सीधा सा जवाब दिया।
” पान खाने गये है?”  सतीश शर्मा ने उसी अंदाज में बात को दुहरा दिया, ” खाना खाने के बाद पान खाना। शाम को वाउचर साइन किया और हजार- पाँच सौ रूपये पर डे लेकर चल दिये। अपने चीफ असिस्टैन्ट साहब से कहना कि जरा फुरसत मिले तो स्क्रिप्ट लेकर यहाँ भी आ जाये।”  इस्माइल अपने चीफ को बुलाने चला गया।
” यार राजन, बिहारी की मेन्टालिटी कुछ मेरी समझ में आती नहीं। सतीश शर्मा अपने असिस्टैन्ट के बारे में कैमरामैन को बताने लगे कि यह मोटू बड़ी ही झक्की किस्म का आदमी है। पिछले पंद्रह सालों से लोगों को असिस्ट कर रहा है। अब तक इसकी कोई क्रियेटीविटी सामने नहीं आयी। बिना पूछे सलाह देगा और कोई काम की बात पूछो, तो उसकी जानकारी इसको रहेगी ही नहीं । भगवान जाने ऐसे लोगों का क्या होगा?
                                           * * *
यार विशाल, दो – ढ़ाई लाख की पार्टी मिल जाये तो बस, ” रशीद कोई बहुत बड़ी योजना का खाका बनाने में मशगूल था,  ” एक डेढ़ महिने में फिल्म तैयार। अपनी लागत प्लस मुनाफा अंदर…. वह भी टेबल कैश, क्या समझे?”
” भाई मेरे, डेढ़ घंटे की फिल्म का सारा काम एक डेढ़ महिने में फिनीश हो जायेगा?” विशाल ने अपनी असहमती के साथ शंका जताई।
” इसमें प्राबलम क्या है? कौन सी हम लोग मुगले आजम या शोले. बनाने जा रहे हैं।”  रशीद ने चाय की चुस्की ली।
” फिर भी यार, मुझे नहीं लगता की दो- ढा़ई लाख के बजट में डेढ़ घंटे की फिल्म और वह भी डेढ़ महिने में तैयार हो जायेगी।” अपनी शंका को बरकरार रखते हुये विशाल ने मुस्कराते हुये कहा,  ” आठ- नौ लाख टेबल कैश? यदि ऐसा होता ना,  तो बंबई में जो चार सौ बैनर है न, सबके सब ब्लू फिल्म ही बनाते।”
” तुझे इक्सपीरियेंस नहीं है न, इसलिए तू समझ नहीं पा रहा है। अभी अपनी कोई ऐसी फिल्म नहीं बन रही है कि तुझे दिखाता कि ब्लू फिल्मों का नेटवर्क कितना चुस्त दुरूस्त होता है।” रशीद ने विश्वास के साथ समझाया।
” फिर भी ।”
” देख ।तू समझने की कोशिश कर ।” रशीद ने ब्लू फिल्मों के बारे में विस्तार से बताना शुरू किया।,  ” डेढ़ घंटे की गरमा गरम कहानी पहले चूज कर ले। एक बात ध्यान रखें कि कहानी में चार से ज्यादा कैरेक्टर नहीं होना चाहिये। कहानी की हिरोइन का रोल दमदार होना चाहिए ताकि उसे ज्यादा से ज्यादा एक्सपोज किया जा सके। ज्यादा सेट चेंजेस भी नहीं होना चाहिए |एक घर एक बेडरूम के अंदर ही सारी कहानी होनी चाहिये। ज्यादा से ज्यादा दस दिन की शुटिंग होगी। उसके लिए कैमरा, लाइट, जो भी इक्किपमेंट लगेंगे उसका पर डे नहीं ,लंपसंप में पे करेंगे। शुटिंग के लिए अपने को डे नाइट लगे रहना पड़ेगा। इसलिए पूरी युनिट लेकर सीधे खंडाला या माथेरान के किसी बंगले को बुक कर लो दस बारह दिन के लिए। गाने- वाने की शुटिंग का कोई झंझट नहीं। शुटिंग खत्म हुआ तो सीधे एडिटिंग टेबल पर। ऐसी फिल्म में फिर से डबिंग करने की कोई जरूरत नहीं। म्युजिक पीस उठाकर बैकग्राउंड में डाल दो। अगर जरूरत हो तो लाइव्ह और रिकार्डेड इफेक्ट डाल दो। नहीं तो करा लो मिक्सिंग। जितने भी  गरम सीन हो उसको निकालकर सेंसर से सर्टिर्फिकेट ले लो। हैदराबाद, मद्रास, इलाहाबाद, अमृतसर,  बिहार टेरीटरी के डिस्ट्रीब्यूटर हाथों- हाथ कैश देकर प्रिंट ले जायेंगे। पैसा जेब में आया कहानी खत्म ।” रशीद के मुख पर संतुष्टि के ऐसे भाव थे जैसे उसने सचमुच आठ -नौ लाख रूपये अभी-अभी जेब में रखे हो।
” वो तो ठीक है लेकिन लड़की….।”
“धत्  तेरी की। इसी बंबई में ऐसी पचासों लड़कियों को मैं जानता हूँ जो ब्लू फिल्म में काम करती हैं।”
” अच्छा”
” पच्चीस- पच्चास हजार रूपये में,” रशीद ने आँख मारते हुए धीरे से कहा,     ” अपना सब कुछ खोल खालकर दिखा देती हैं।”
विशाल के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट तैर गई। उसने चाय पूरा खत्म कर दिया। जेब से दो सिगरेट निकालकर एक रशीद को थमा दी और दूसरी अपनी होठों में दबा ली।
” यार विशाल,” लाइटर से अपनी सिगरेट सुलगाने के बाद उसके आगे लौ कर दी,  ” ऐसी पाँच फिल्मों के प्रोडक्शन और डायरेक्शन में असिस्ट कर चुका हूँ। अब तो अपने को लगता है कि इससे ज्यादा मुनाफा का कोई धंधा है ही नहीं।”
” इतना कान्फिडेन्स है तो कोई अपनी फिल्म शुरू क्यों नहीं करता?” विशाल ने बड़ी सहजता से पूछा।
” यार विशाल ,तू एकदम लल्लू है,” रशीद अब थोड़ा उखड़ गया,  ” अभी तक मेरी बात को नहीं समझा । मेरे पास इक्सपीरियंस है ऐसी फिल्मों का, लेकिन फाइनेंस नहीं है मेरे पास।
विशाल चुप रहा। विशाल को कुछ न बोलते देख रशीद ने अपना बोलना शुरू किया,  ” वैसे मैं कई पार्टी से बात कर रहा हूँ। क्या है ये बंबई है। यहाँ कभी न कभी ,कोई न कोई ,किसी न किसी से टकराता  रहता है। मैंने तुझे ये सारी बातें इसलिए बताई कि अगर दो- ढ़ाई लाख की कोई पार्टी तेरे निगाह में हो जो तेरे कहने पर पैसा लगाने के लिये तैयार हो तो समझ, तेरा भी बेड़ा पार हो जायेगा।”
” वो कैसे?”
“देख ,तू पार्टी को किस तरह समझायेगा, ” एक कश खींचकर रशीद ने बोलना शुरू किया,  ” पार्टी को बोलने का कि आप जितना पैसा लगायेंगे उसका डेढ़ गुना पैसा आपको तीन महिने बाद वापस मिलेगा। सेफ्टी के लिये तीन महिने का टाइम जरूरी है। हमको क्या मिल रहा है, कितना मुनाफा हो रहा है उससे पार्टी का कोई मतलब नहीं। पार्टी अगर तेरे पटाने पर पैसा लगाती है तो तुझे मैं दूंगा पच्चीस हजार रुपये।”
” पच्चीस हजार रुपये।” विशाल की आँखे चौड़ी हो गई।
” कम है क्या?”
” कम नहीं तो ज्यादा भी तो नहीं है।”
” अबे फिल्म का बजट तो देख। तुझे एक लाख दे दूंगा तो फिल्म कैसे बनेगी?” धीरे से लेकिन कड़ककर रशीद बोला।
विशाल भी कुछ सहम गया Iसिगरेट को उसने बाये हाथों की उगलियों में फंसाया और दाहिने हाथ से बडे़-बड़े बालों को पीछे की ओर सहलाने लगा।
” एकदम ईमानदारी का धंधा है ये Iकोई चिटिंग नहीं, कहीं कोई गड़बड़ नहीं।” रशीद ने अपने बात पर विश्वास की मुहर लगाते हुए कहा,  ” अपने पास पूरा नेटवर्क है। प्रोडक्शन से लेकर डिस्ट्रीब्यूशन तक। कहीं कोई लफड़ा नहीं।”
” ठीक है रशीद ।”  विशाल ऐसे उचका जैसे अब कोई अविश्वास की गुंजाइश ही नहीं रही हो,  ” एक दो ऐसे लोग अपने पास हैं जिनके लिए दो – तीन पेटी कोई बड़ी बात नहीं है। मैं बात करके देखता हूँ। फिर बताऊंगा तुम्हें।”
कुर्सी पर से उठकर रशीद ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। विशाल को लगा कि वे दोनों इस इरानी रेस्तरां में काफी देर से बैठे हैं। उसने भी अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया।
” ऑल द बेस्ट विशाल।”
विशाल मुस्कराकर रह गया Iरशीद ने चाय के पैसे दिये और दोनों बाहर आ गये। सामने अंधेरी स्टेशन के अंदर जाने वाले और बाहर निकलने वालों में पानीपत की लड़ाई हो रही थी।
” अच्छा रशीद । एक बात बताना?”
” क्या बात है भई? पूछ।”
” ये बेडरूम के सीन कैस शूट करते हैं?”
” मतलब?”
” मतलब ये कि इतनी युनिट के सामने” अपने होठों को काटकर,
_
” यार लड़कियाँ नंगी कैसे हो जाती हैं?”
” पैसा!!! ये पैसा कुछ भी करवा सकता है।”
” कितना पैसा मिलता होगा उनको?”
” पचास-साठ हज़ार और क्या? लेकिन एक बात है विशाल कि पैसे की लालच में हर लड़की के कपड़े नहीं उतार सकते तुम । ये कपड़े उतारने वाली लड़कियाँ कुछ खास किस्म की होती है।
” खास किस्म की!!! मतलब?”
” मतलब कपड़ा उतारकर नंगा हो जाना सबके बस की बात नहीं है। कुछ लालच में तैयार होती है, कुछ शौकवश तैयार होती है।” रशीद ने बात बदलते हुये कहा, “बड़ी मेकैनिकल होती हैं ये लड़कियाँ। पार्ट ऑफ लाइफ या समझो पार्ट ऑफ जॉब समझकर काम करती है ।”
” ब्लू फिल्में तो केवल बदनाम है। आज कल तो टॉप की हीरोइने कपड़े उतारने में परहेज नहीं करती। जिसे देखो, वही कपड़े उतारने में लगी हुई है।”
” जितना पैसा ये बड़े बैनर में काम करनेवाली हीरोइने ले लेती है, उनसे ज्यादा अंग दिखानेवाली ब्लू फिल्म की हीरोइनों को बहुत कम पैसा मिलता है ।”  रशीद ने संवेदना प्रकट की ।
” अब आप जैसे प्रोड्यूसर….” विशाल ने बात अधूरी छोड़ दी।
” क्या करे मजबूरी है…..” रशीद ने मजबूरी बताई।
” अच्छा एक बात बताओ रशीद” विशाल ने फिर कुछ जानना चाहा।
” मुफ्त का मज़ा ले रहे हो ।” रशीद ने व्यंग्य में फिरकी कसी।
” नहीं यार। इसमें मज़ा क्या ले रहा हूँ।” विशाल ने बायीं आँख दबाते हुये कहा,  ” थोड़ी नॉलेज ले रहा हूँ और क्या ?”
 “पूछ”
” जब ऐसे सीन शूट करते हो तो….” विशाल चुप ।
” तो के आगे तो बोल।”
” मेरा मतलब युनिट के मेम्बरों पर कुछ फर्क- वर्क पड़ता है ।”
” वो लोग आदमी नहीं हैं क्या?”
” इसलिए तो पूछ रहा हूँ।”
” फर्क सब के उपर पड़ता है। कभी-कभी तो कैमरामैन का हाथ कांपने लगता है, लेकिन सबकी अपनी ड्यूटी है। जब तक सेट पर हो तब तक एक भी गल्ती नहीं होनी चाहिए। पैकअप के बाद जाकर तुम किसी के कपड़े उतारकर अपने मन की हवस पूरी कर लो, किसने रोका है।” रशीद ने ऐसे कहा जैसे वह सचमुच का प्रोड्यूसर बन गया हो।
” ठीक है। मैं पार्टी से बात करता हूँ। बाद में फोन करूंगा” विशाल चलने के मूड में था। लेकिन रशीद की बातों का तार अभी टूटा नहीं था, ” वैसे भी जहाँ पेट्रोल और चिंगारी हो, शोला भड़कते कितनी देर लगती है? चल। बाय |”
                                         * * *
रात ग्यारह बजे बिहारी कालोनी के गेट के भीतर घुसा तो दुकान पर बैठे अब्दुल मियाँ ने उसे बुला लिया। बिहारी कोई बात करने के मूड में नहीं था लेकिन टेलीफोन मैसेज के कारण उसे जाना पड़ा।
” बिहारी मियाँ, ये लो” कहते हुये अब्दुल ने एक किलो मिठाई का डिब्बा बिहारी के हाथों में रख दिया। इसके पहले कि बिहारी कुछ समझ पाता, अब्दुल ने बताया कि एक लड़का जिसका नाम शशांक था, तुम्हें देने के लिए कह गया। बिहारी ने कारण पूछा तो अब्दुल ने कहा कि उसने केवल मिठाई का डिब्बा दिया और बोला  सुबह ठीक आठ बजे वह आपको फोन करेगा । डिब्बे में से बर्फी के चार बड़े बड़े टुकड़े उसने अब्दुल मियाँ को दे दिये। कमरे में विशाल, शेखर और स्वामी सोये पडे़ हैं। कमरा शराब की बदबू से तर था। तस्तरी उठाकर देखी तो कटोरी में दाल और अखबार के पन्ने में रोटी लपेटकर रखी थी। बिहारी को खाना खाने की इच्छा नहीं हुई Iबर्फी के तीन-चार टुकड़े खाकर दो गिलास पानी पिया और कपड़े बदलकर फटी हुई चटाई पर स्वामी के बगल में लेट गया। स्वामी के पसीने से कच्ची शराब
की हल्कि- हल्कि बू आने के कारण उसने दिवार की ओर मुँह फेर लिया। इस बंबई में बिहारी को नौ- दस साल हो गये। उसने बंबई में बहुत रंगीनी देखी थी। दायी कलाई से आँखो को ढकना चाहा कि हाथ पर गोदना गुंदे हुये नीले अक्षरों पर उसकी नजर पड़ गई — अखिलेश सिन्हा। पटना की ही बाजार में तो उसने गुदवाया था यह नाम — अखिलेश सिन्हा। एक लंबा अरसा हो गया पटना गये। पटना से बंबई आया और यहीं का होकर रह गया। घर- द्वार, माता – पिता, परिवार-रिश्तेदार, दोस्त- दुश्मन सब के सब पीछे छूट गये। अब तो बस फलाना फिल्म , फलाना निर्माता, फलाना निर्देशक, फलाना  स्टुडियाें, डबिंग,  शुटिंग,  रिकॉर्डिंग  मिक्सिंग,  हिट फ्लॉप,  सुपर हीरो,  सेक्सी हीरोइन  , डे सिफ्ट, नाइट सिफ्ट — बस इन्हीं सब के बीच तो वह सांस ले रहा है। पटना यूनिवर्सिटी  का होनहार  छात्र   अखिलेश सिन्हा बंबई आकर स्ट्रगलर आर्थात् असिस्टैन्ट डायरेक्टर बिहारी बन गया I अखिलेश सिन्हा से बिहारी तक का सफर करनेवाला यह यात्री इस कमरे को पड़ाव समझता है। उसे जाना है बहुत दूर तक जाना है।
आज से दस  – बारह वर्ष पहले अखिलेश  सिन्हा पटना युनिवर्सिटी में बी.ए. प्रथम वर्ष का  छात्र  था। कोर्स में एक विषय के रूप में साहित्य अनिवार्य था लेकिन अखिलेश के लिये यह विषय बहुत बोरींग होती थी। परीक्षा के लिये  इन विषयों की तैयारी के चक्कर  में एक – दो ऐसी साहित्यिक कताबें उसने पढ़ डाली , कि उसके मस्तिष्क पर अपनी एक अलग ही छाप छोड़ गई।….. और धीरे -धीरे   अखिलेश सिन्हा साहित्यिक कृतियों का दिवाना हो गया । गबन , गोदान, कर्मनाशा की हार, कालीगंज की बहू , मुर्दाघर , महाभोज , कमला , निर्मला , गीतांजली जैसी किताबों को पढ़ने का सौभाग्य मिलता रहा। धीरे – धीरे युनिवर्सिटी में होने वाले नाटकों में भी उसकी रूची बढ़ने लगी। शुरु –  शुरू में अंतिम कलाकार की हैसियत से दरी बिछाना,  घंटी बजाना , पर्दा खींचना, खिड़की पर टिकट फाड़ना  और  दरवाजे पर खड़े होकर चेक करना , मध्यांतर में  कलाकारों के लिये चाय – पानी की व्यवस्था जैसे छोटे-मोटे जिम्मेदारी वाले काम अखिलेश सिन्हा के हिस्से आते थे। सिन्हा इन सब कामों को उत्तरदायित्व की भावना से अपना कर्तव्य समझ के करता  था।
बी. ए. के बाद बी. एड. करके कहीं अध्यापकी करने की योजना बनाकर पटना युनिवर्सिटी में अपना नाम लिखानेवाला  अखिलेश सिन्हा अब रंगमंच, नाटक, कहानी, अभिनय, पात्र चित्रण, चरित्र रेखांकन, राष्ट्रीय समस्याए, आँचलिक संस्कृत- संस्कार जैसे विषयों पर गहन चिंतन करने लगा था। और धीरे-धीरे उसके मन में ये बात गहरी बैठ गई कि,  ” जीवन में कुछ न कुछ तो करना ही है लेकिन अध्यापकी के अलावा।”  परन्तु      ” “कुछ न कुछ”  को वह सोच नहीं पा रहा था कि किस लक्ष्य पर केन्द्रित करें ? कभी-कभी जब मनुष्य अपने चिंतन के चरम पर पहुँचकर भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाता तब उसे अपनी चिंता को कालचक्र के भरोसे छोड़ देना चाहिए। कुछ ऐसा ही हुआ अखिलेश सिन्हा के साथ। बी.ए. अंतिम वर्ष पहुँचते-पहुँचते अखिलेश सिन्हा कला क्षेत्र के कई अनुभवों और जानकारियों से परिचित हो चुका था। कला के ही क्षेत्र में  ” कुछ  न कुछ” करने की भावना उसके मन को आदोलित करती  थी, परन्तु यह  “कुछ न कुछ” का पिक्चर अभी धुंधला ही था। यदि मन में सच्ची चाह हो तो राह अपने आप बनती जायेगी। कुछ ऐसा ही हुआ अखिलेश सिन्हा के साथ – एक दिन उसने सागर  सरहदी की फिल्म “बाजार” देखी। फिल्म की कहानी, नसीर-शबाना – ओमपुरी की अभियन क्षमता और निर्देशक का प्रस्तुतिकरण इतना अच्छा  लगा कि  “कुछ न कुछ”  के केन्द्र बिंदु में फिल्म माध्यम बिल्कुल फिट बैठ गया। लेकिन फिल्म में   करेंगे क्या…..?  लेखक, ….. निर्देशक ….. कलाकार….। इन तीनों के अलावा न वह कुछ जानता था और न ही गहराई से सोच पाया।  इस विषय पर उसने ज्यादा सिर न खपाकर का पढ़ाई पूरी करने के बाद सीधा बंबई आ गया। मायानगरी की जादुई कोठरी में घुसने के लिए अखिलेश सिन्हा को एक नहीं,  अनेक अग्निपरीक्षाओं  गुजरना पड़ा…. और एक दिन किसी फिल्म के  सेट पर आपको अप्रेंटिस असिस्टैंट के रूप में पाया। इस छोटी सी सफलता ने उसे यह सबक सिखाया कि अगर उद्देश्य पवित्र हो , संकल्प दृढ़ हो, संकटों को झेलने का हौसला हो, तो एक न एक दिन पुरूषार्थ का ताज  उसके सिर पर होगा। स्ट्रगलरों के भीड़ में एक और नया स्ट्रगलर शामिल हो गया।
….. और  एक दिन किसी के स्नेह ने उसे  “अखिलेश सिन्हा”   से   “बिहारी”  बना दिया। ” सावन भादो” फिल्म में वह सहायक निर्देशक था। उसके जिम्मे केवल कलाकारों को मेकअप रूम से सेट पर ले आने की जिम्मेदारी थी। “रेखा जी को बुलाओ”  के आदेश पर वह मेकअप रूम में रेखा के सामने खड़ा हो गया।  ” मइडम, साट रेडी है। डाइरेक्टर साहब बुला रहे है।”  मुँह को कुछ ज्यादा ही खोलकर “साट” और “डाइरेक्टर” बोलने की अदा ने रेखा को खिलखिलाकर हँसने के लिए मजबूर कर दिया। हँसी थमी तो रेखा अखिलेश को अपने पास बिठाकर बड़े स्नेह से बोली ,   ” अखिलेश । बिहार को भूल जाओ। अब तुम बंबई के फिल्मी एटमास्फीयर में हो। अपने आप को एडजस्ट करने की कोशिश करो वरना तुम्हारी ऐसी ही  इमेज बन जायेगी कि …..।”  इसके आगे रेखा कुछ नहीं बोली | जिसे वह पर्दे पर देखा करता उन्हें अपने सामने और वह उनके मुख से नसीहत सुनकर उसकी आँखों में पानी आ गया। और इसके बाद अखिलेश सिन्हा ने अपने आपको सुधारना शुरू कर दिया, लेकिन यह घटना सेट पर जंगल के आग की तरह फैली |अपने आप को सुधारते – सुधारते उस पर  “बिहारी” नाम का ऐसा ठप्पा लगा कि अखिलेश जाने कहाँ खो गया???
                                         *  *  *
खार- दंडा की घनी चालियों में और खोलियों में कई भावी फिल्मी हस्तियां रहती हैं। आज की फिल्मी दुनियां के ऐसे कई सफल लोग हैं जो कभी इसी खार- दांडा की दस बाई पंद्रह की खोली में अपने जीवन के कई संघर्षमय वर्ष गुजार चुके हैं। संभवतः ऐसे कई गुमनाम लोग अभी भी रह रहे हैं जो आने वाले दिनों में अपनी सफलता का डंका गाड़कर तहलका मचा देंगे। इसी खार- दंडा के गुल्लू तिवारी के चाल में संकरी गली के अंतिम छोर की छ: बाई आठ के कमरे में फिल्मी पत्रकार राज भी रहता है। अपने आप को पूरा फिल्मी इनसाइक्लोपीडियां है राज। हिन्दी फिल्मी दुनियां की ऐसी कौन सी बात है जो वह नहीं जानता। वर्ष १९१३ के फिल्म राजा हरिश्चन्द्र से लेकर आज तक की कोई भी घटना , जानकारी के के बारे में विस्तार के साथ बहुत कुछ बता सकने की योग्यता रखता है फिल्मी पत्रकार राज। अपने नाम के अनुरूप फिल्मी इतिहास के कई राज़ों का राज़दार फिल्मी पत्रकार राज समय आने पर अपनी जानकारी से प्रभावित करने की कोई कोर कसर छोड़ने की चूक नहीं करता। उसके चेहरे -मोहरे से उसकी उम्र का कोई पता नहीं चलता। वैसे दिखने में उसकी उम्र का अनुमान तीस-बत्तीस के करीब लगाया जा सकता है। लेकिन जब वह उन्नीस सौ साठ में बनी किसी फिल्म के युनिट में अपनी उपस्थिति को बयान करता तो लोग दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं। अपने आप में पूरी पहेली है यह फिल्मी पत्रकार राज। नाम के आगे ना कभी जात-पात लगाया और न ही किसी के पूछने पर कुछ बताया। सिर पर छितराये रेशमी बाल जिन्हें वह हमेशा उपर झाड़े रहता था लेकिन फिर भी केश झुंड उसके माथे पर सरक ही आता था। दिखने में सुंदर। काली आँखे, लंबा नुकीला मुँह । मूँछ दाढ़ी  सफाचट  । पहनावा  ऐसा जो उसके पर्सेनालिटी को जंचता था। चाहे बुशशर्ट पैंट हो या कुर्ता पैजामा । पैरों में फैशन के हिसाब से सैंडल।
न जाने कई सालों से वह बंबई में है, कहाँ से आया है, परिवार में कौन-कौन है, उसके साथ खास दोस्ती का दम भरनेवाले मित्र भी नहीं जानते थे। हालांकि शराब  उसकी कमजोरी थी लेकिन न कभी वह किसी गटर में पड़ा मिला और न ही कभी किसी ने उसे अनाप शनाप बकते या बहकते हुये देखा हो। दोपहर के ग्यारह बज रहे हैं पर राजजी सोये पड़े हैं। टेलिफोन घंटी लगातार बज रही है। करीब  दस बारह बार लगातार बजने के बाद उनकी नींद टूटी I
” हैलो”   आवाज भारी थी।
” राजजी,  अभी तक सो रहे है क्या?”
” हा विशाल, बोलो ।” नींद के दबाव में सिर अभी तक भारी था ।
” शाम को आप आ रहे हैं न?”
” कहाँ?”
” अरे वाह । भूल गये । सेन्टॉर होटल में। ” हम तो तेरे आशिक है” की गोल्डेन जुबली पार्टी है।”
” हाँ हाँ।” याद करते हुये सिर खुजाकर,  ” शाम सात बजे तक पहुँच जाऊँगा। वो जो मैंने तुझे बीयरर चेक दिया था, वो कैश हुआ या नहीं।”
” इसलिए तो फोन किया ।  पैसे लेकर घर पर आऊ या शाम को वहीं पार्टी में दे दूँ आपको।”
” चलो उस स्साले दलिद्दर का चेक पास तो हो गया। शाम को दे देना। अभी तकलीफ करने की क्या जरूरत हैं?”
” ठीक है फोन रखता हूँ । गुड डे |”
” चलो। ओ के, बाय।”  रिसिवर को क्रेडिल पर रखकर कुछ क्षण के लिये राज ने अपनी आँखें मूंद ली। दस मिनट बाद  दरवाजे पर दस्तक हुई। राज ने अपनी आँखें खोली। तीन चार लिखे हुये पन्ने और पेपर पैड सिरहाने पसरे हुये थे। कलम उनकी बनियान में लटकी पड़ी थी। खड़े होकर पहले तहमद को कमर में अच्छी तरह   लपेटा । दरवाजे पर फिर दस्तक हुई । “आ रहा हूँ भई” कहते हुये उन्होंने दरवाजा खोल दिया। सामने चालीस साल के करीब उम्र की एक महाराष्ट्रीयन औरत खड़ी थी।
” ओऽऽऽ ताई ! तुम!!” राजजी फिर अपने बिस्तर पर आ ये ।
” मैं तुमको कितना बोलती हूँ कि रात्र भर जागने का नहीं लेकिन तुम .समझता ही नहीं।” ताई अंदर आयी और रात के जूठे बर्तन को बटोरने लगी। उसने अपना कहना जारी रखा,  ” सुरेखा के वडिल बोलते है कि रात्र भर जागा करने से तबियत को त्रास होता है। मगर तुम है कि परवा  नहीं करता।
” ताई। ये लिखने पढ़ने का काम मेरे से दिन में नहीं होता है। अब देखो, रातभर में मैंने बीस पन्ना लिखा।”  पन्नों को दिखाते हुये, ” रात में काम बहुत आराम से होता है और दिमाग भी चुस्त रहता है।”
” तुम जानो , तुम्हारा काम जाने I” कहते हुये ताई बर्तन लेकर दरवाजे पर गई और मुड़कर बोली,  ” जेवड़ तैयार है, आंगोल  हो जाये तो आवाज लगाना l” कहती हुई चली गई।
राजजी ने ध्यान न देते हुये रिमोट से टीवी ऑन कर लिया जिसपर कोई धारावाहिक आ  रहा था। दो खोली छोड़कर ताई की खोली थी जिसमें वह अपने पति और एकलौती बेटी सुरेखा के साथ रहती है। सुरेखा नरसी मोनजी कॉलेज में बी.ए. प्रथम वर्ष की  छात्रा है। ताई और राजजी के बीच मुँहबोले भाई – बहन का रिस्ता है। ताई स्वभाव की कोमल और दिल की साफ, एक धार्मिक प्रवृति की महिला है जो दोपहर और रात का भोजन राज के यहाँ समय से पहुँचा जाती थी। भोजन के बदले में उसने कभी कुछ  मांगा नहीं लेकिन राज हर महिने को दस तारीख को पाँच सौ रूपये सुरेखा के हाथ में रख देता था I
” मैंने तुमको कितनी बार बोला कि ये पैसा वैसा देने का नहीं।”
” तुमको कौन देता है ताई। ये पैसा तो मैं अपनी भांजी को दे रहा हूँ उसकी पढ़ाई – लिखाई के लिए।”
” उसकी भी जरूरत नहीं। आदत खराब हो जायेगी इसकी।”
” पाँच सौ रूपये में क्या आदत खराब होगी। हमारी सुरेखा बहुत समझदार लड़की है ताई। बी .ए. के बाद एम.ए. और एम. ए. के बाद पी.एच.डी. भी कराउंगा इसे। तुम देखती रहना।”
“जास्ती पढ़ाके इसे पागल नहीं बनाना है। अब मेरा और मेरे मरद के जिंदगी में जो कुछ भी होना था,  सो हो गया।”
” अब मेरे को सुरेखा की चिंता रहती है। कोई अच्छा लड़का मिल जाये तो इसका लगीन करके अपनी जवाबदारी पुरा करना है बस।”

अपनी शादी की बात सुनकर सुरेखा लाज के मारे बाहर चली जाती है।

” भाऊ” राज को अपना  समझकर ताई अपने दिल की बात कहने में कोई संकोच नहीं करती,  “इसका वडिल अब और कितने साल फिल्मी चक्कर में अपने को बरबाद करेंगा, भगवान जाने। दो-चार सेठ लोगों के यहाँ पूजा-पाठ से जाे कुछ भी मिलता है, उसी से घर का खर्चा आराम से चल रहा है। सुरेखा के शादी के लिये मेरे पास बहुत गहना है । वही मैं बेटी के दहेज में दे दूंगी। मिश्रा और मेरे को बस सुरेखा की ही चिंता रहती है। भगवान ने हमको कोई और बच्चा दिया नहीं। सुरेखा से ही हमको सब शौक पूरा करना है।  जितना पढ़ेगी उतना पढ़ायेंगे और अच्छा घर देखकर लगीन कर देंगे।”
” चिंता मत करो ताई। उपरवाला है न, वो सबका भला करता है।” इस तरह से  ताई और राज मे के बीच पवित्र भावनात्मक रिस्ते की बुनियाद कामय है। फिल्मी पार्टियों में मिलें ढ़ेर सारे उपहार वह सुरेखा को दे दिया करता था। पाँच सौ रुपये के अलावा वह और भी रूपये देना चाहता तो ताई साफ इंकार कर देती। रात एक डेढ़ बजे राज घर लौटता। ढ़क कर रखे भोजन को खाता और सुबह के चार बजे तक इंटरव्यू  और लेखों को कागज पर उतारता। उन्हें लिफाफे में बंद करके अगले दिन दोपहर के ग्यारह बजे तक के लिए सो जाता। यही रोजमर्रा की जिंदगी थी फिल्मी पत्रकार राज की ,फिल्मों से जुड़ा हर शख्स जो उसे जानता था , “राज़जी” कहकर ही पुकारता था। उत्तर एवं मध्य भारत में प्रकाशित होने वाले पच्चीसों अखबार और  सामयिक पत्रिकाओं में राज के लेख एवं फिल्मीं साक्षात्कार प्रकाशित होते रहते हैं। ताई के पति मिश्र …. अच्युतानंद मिश्र उसके पुराने मित्रों में से है। अच्युतानंद मिश्र फिल्मी मुहुर्तो में पूजा-पाठ- हवन करवाते है। छोटे-मोटे कुल मिलाकर सौ से अधिक फिल्मों में आयाराम – गयाराम जैसे चरित्र की भूमिका निभाने के बाद भी राह चलते उन्हें कोई नहीं टोकता कि –” हे भाई साहब, हमने आपकी फिल्म देखी है।”
                                        *  * *
होटल पामग्रोव के पुल साइड गेट पर पिछले दो घंटे से खड़ा विशाल बोर हो रहा था । विशाल को किसी का इंतजार बहुत खलता है। आज उसकी मुलाकात एक ऐसे पार्टी से होने वाली थी जो उसे ब्लू फिल्म बनाने के लिए पाँच लाख रूपये का फाइनेन्स करनेवाला था। ” चूतियानंदन भी अजीब आदमी है। ”   विशाल मन ही मन खीझ उठा। अच्युतानंद मिश्र ने उसे ठीक चार बजे पुल साइड के गेट पर खड़े रहने का निर्देश दिया था,  शाम को सात बजने को है लेकिन अच्युतानंद और उनके पार्टी का कहीं अता-पता नहीं । जब विशाल ने उसके घर पर फोन किया तो अच्युतानंद की पत्नी ने बताया कि वे सुबह ही घर से निकल चुके हैं।
” कहीं फुकट के पीने को मिल गई होगी, पीकर लुढ़क गया होगा ।”   विशाल मन ही मन सोचने  लगा कि  दस बजे तक वह क्या करे कि उसका टाइम पास हो जाये। होटल सी  प्रिन्सेस में चौकीदारी करने वाले अपने गाँव के  एक व्यक्ति से मिलने का मन बनाकर वह पैदल ही चल पड़ा l जुहू पुलिस चौकी के पास रिक्शे में बैठकर ग्राहकों की तलाश में मंडराती सुंदर – सुंदर कन्याओं को देखकर विशाल के मन में सुरसुरी होने लगी।  लगभग दो महिने पहले एक जूनियर आर्टिस्ट के साथ रात भर का क्रिया कर्म किया था। क्रिया कर्म के उमिद में वह बस स्टाप से थोड़ी दूर पर दिवाल पर पीठ टीकाकर खड़ा हो गया। जुहू सड़क की यू टर्न पर कई रिक्शे मुड़ते, लड़कियाँ आँखों ही आँखों इशारा करती , विशाल को मन मुताबिक हसीन चेहरा, भरा फूला वक्ष एवं कटीला फीगर न दिखने पर “ना” में सिर हिला देता। छ:- सात को “ना” करने के बाद एक नेपाली कन्या ने आँख मटकाई। एक ही जैसी लड़कियों का बिस्तर गर्म करते-करते विशालका मन भर गया था । एक नेपालिन की नस ढीली करने के    सिहरन ने उसके तन मन को मदहोश कर दिया। सौ रूपये में सौदा तय होने कै बाद  रिक्शा फर्राटे के साथ दौड़ पड़ा। इस तरह की सड़क छाप वेश्या के साथ उसका पहला अनुभव था। वह नेपालिन कन्या विशाल को लेकर होटल चट्टान के पीछे झोपड़पट्टी में ले गई । झोपड़ी की कई कतारों को पार करने के बाद चहारदिवारी के पास एक  कोने की झोपड़ी के सामने पाँच-छ: वेश्याए अपने-अपने ग्राहकों के साथ खड़ी थी। विशाल को इस भीड़ का कोई मतलब समझ में नहीं आया।
” दस मिनट रुकने का भाई, मैं अभी आई  ।” इतना कहकर वह लड़की बगल वाली गली में घुस गई। उसके मुँह से “भाई” सुनकर वह क्षणभर के लिए झेप गया।
इस भीड़ में विशाल को कुछ शर्मिंदगी महसूस होने लगी। झोपड़ी का टूटा फूटा दरवाजा खुला और एक लड़की अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ बाहर निकली। उस व्यक्ति का चेहरा फीका-फीका नज़र आ रहा था। जल्दबाजी में बाहर निकलने के कारण वह लड़की अपनी समीज का चेन दूसरी लड़की से बन्द कराने लगी। विशाल की नज़र उसकी पीठ पर पड़ी। काली मांसल पीठ पर सफेद रंग की ब्रा की पट्टी देखकर विशाल का मन  घिन्न से भर गया। एक जोड़ी झोपड़ी के अंदर दाखिल हो गई। अंदर के तख्त के चरमराने की आवाज आने लगी। इस तरह के माहौल से उसका पहली बार पाला पड़ा था | इससे पहले वह नटराज , चांदीवली, फिल्मालय के मेकअप रूम में कई जूनियर एक्स्ट्रा लड़कियों को पचास-सौ रूपये में चूस चुका  था। दस मिनट हो गये लेकिन उस नेपालिन का कोई अता पता नहीं | “मुझे यहाँ फंसाकर पता नहीं कहाँ चली गई।” विशाल के चेहरे पर परेशानी का भाव देखकर एक लड़की जो अपने ग्राहक के कमर में हाथ डाले चूमा  चाटी कर रही थी, जोर से बोल उठी   ” वो  साली मोहिनी बहुत हरामी है। एक ग्राहक को यहाँ खड़ा करके हरामजादी दूसरे ग्राहक के चक्कर में घूम रही होगी।”
विशाल को यहाँ का वातावरण असहनीय लगा।वह यहाँ से जाने के लिये उसी गली में घुस गया जिसमें वह नेपालिन कन्या गई धी। दबड़ेनुमा दुर्गंधयुक्त झोपड़ों की बस्ती में विशाल का दम घुटा जा रहा था । वह जल्द सड़क पर पहुँचने की जल्दी में एक के बाद एक गलियों को पार करता जा रहा था। एक गली में जैसे ही वह घुसा उसने देखा कि दूसरी छोर पर गुलाबी रंग की साड़ी पहने बिना किसी मेकअप के एक सांवली  सी लड़की खड़ी थी। उसकी उम्र ज्यादा  से ज्यादा बीस – इक्कीस  की  होगी विशाल ने सोचा इस गली में वह आगे न जाये लेकिन इसके अलावा दूसरी गली भी नहीं थी। इन दोनों के अलावा वहाँ कोई तीसरा  नहीं था। विशाल के कदम उसी ओर बढ़े। लड़की के चेहरे पर सागर की लहरों की तरह उफनती मुस्कान थी। विशाल उसके बगल से होकर आगे निकलना ही चाहता था कि उस  लड़की ने विशाल  का दायाँ हाथ पकड़ लिया। लड़की ने आँखों से उसे अपने घर की ओर  इशारा किया। विशाल ने खुले दरवाजे के भीतर देखा तो साफ सुथरा घर नज़र आया। उस लड़की के जूड़े में फंसा मोगरे का मोटा गजरा अपनी भीनी- भीनी सुगंध बिखेर रहा था।
” आओ न मिस्टर । तबियत ठीक कर दूंगी l” कहकर उस लड़की ने विशाल के दाये हाथ हथेली को अपने बाये स्तन पर रख दिया। हथेली की उंगलियों की नसे चरचरा  उठी। ब्लाउज के बाहर भरे फूले स्तन की कसावट से फिसलते हुये विशाल की नज़र उसके पेट पर गई। पेट ज्यादा निकला हुआ नहीं था। जूनियर एक्स्ट्रा के निकले पेट  से उसे एलर्जी हो गई थी। लड़की  ने उसके हथेली पर हल्का सा  दाब लगाया‍।
” कितना लोगी?”  विशाल इतना ही पूछ  पाया था  कि उसने एक झटके के साथ उसे भीतर खींचकर दरवाजे की सिटकनी लगा दी। अपने पल्लू को नीचे गिराकर विशाल को अपनी बाहों में लपेटते हुये उस लड़की ने एक हल्का का चुंबन लेकर कहा, ” पैसे का क्या? जो मन आये, दे देना। कोई हवेली थोड़े ही मांगूगी।”
To be continue on next page 2, Click on http://www.rajeshdubeay.com/struggler-hindi-novel-2/

Leave a Reply

Your email address will not be published.