Struggler (Hindi Novel) [4]

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  ” हिंदू मस्लिम सिख इसाई, आपस में सब भाई-भाई ”  धर्मनिरपेक्ष भारत में राष्ट्रीय एकता की भावना कहीं दिखाई दे या न दे लेकिन फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग जाति -धर्म, ऊंच-नीच के भेदभाव से कोसों दूर रहकर एक यूनिट में परिवार के सदस्यों की तरह काम करते हैं l किसी भी फिल्म मुहूर्त के समय कैमरे की पूजा गणेश वंदना के मंत्र से ही शुभारंभ किया जाता है भले ही उस फिल्म का निर्माता मुसलमान हो। शुटिंग के दिन पहले सीन के पहले शॉट के पहले टेक के लिये निर्देशक के  ‘एक्सन’ चिल्लाते  ही बलि प्रथा का पालन करते हुए स्पॉट बॉय द्वारा नारियल फोड़ा जाता है जिसमें शक्कर मिलाकर प्रसाद बांटा जाता है। जिसे हर कोई ग्रहण करता है चाहे वह मुसलमान हो या ईसाई । मुसलमान निर्माता हिंदू निर्देशक को निर्देशन की जिम्मेदारी देता है जो किरदार के अनुसार जाति धर्म का परहेज करते हुए पूरी यूनिट की नियुक्ति करता है।

फिल्म स्ट्रगलर की जाति- धर्म का भेदभाव न रखते हुए एक दूसरे की मदद करते हैं । एक ही कमरे में कई स्ट्रगलर एक साथ खाते- पीते , सोते-जागते कई बरस गुजार देते हैं। नई फिल्म की मुहूर्त , फिल्म में आर्टिस्ट कास्टिंग का समय,  ऑफिस का पता, निर्माता-निर्देशक की बैकग्राउंड , स्टूडियों में फिल्म शुटिंग जैसी कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ स्ट्गलरों की दुनिया में आसानी से सभी स्ट्रगलरों को खबर हो जाती है। शिशु जब तक प्राकृतिक अवस्था में रहता है, कपड़ों द्वारा अपने अंग को ढ़ंकने के महत्व को नहीं जानता तब तक उसके मन में काम भावना की जागृति नहीं होती l उसका मन निष्पाप होता है । जब कोई सड़क छाप स्ट्रगलर छोटी- मोटी अथवा बड़ी सफलता पाने में कामयाब हो जाता है तब सबसे पहले वह अपने पुराने दिनों के स्ट्रगलर साथियों से कन्नी काटता है, जैसे एक बालक जब कपड़े द्वारा छुपाये जाने वाले अंगों के बारे में जान जाता है तब उसके मन में वासना की भावनाएं अंकुरित होने लगती है।

रिमांड पर लिए गए सभी कैदियों को थाने के आंगन में लाइन हाजिर होने का आदेश दिया गया । अच्युतानंद और विशाल जो कि ब्लू फिल्म बनाने और पाँच लाख रूपये गबन के आरोपी है,  बुझे मन,  थके हारे, सभी कैदियों की कतार में खड़े हो गए । पुलिस हवलदार एक एक कैदी से उनका नाम पूछकर उनके आरोपों के चार्जशीट की फाइल पर उनके हस्ताक्षर लेने लगे l विशाल और अच्युतानंद उस अनाप-शनाप बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई और चारा नहीं है जबकि उनके मन में इस नर्क से मुक्ति का विश्वास था कि विशाल के लिए कुसुम और अच्युतानंद के लिए उसकी पत्नी पाँच पाँच हजार रूपये वरिष्ठ इंस्पेक्टर मनोहर गायकवाड के चरणों में समर्पित कर आए थे ।

  ‘चलो फटाफट , जिनके ऊपर मर्डर और हाफ मर्डर का लोचा लपाचा है वो सब गांडू लोग बड़ी वाली पुलिस वैन में बैठ जाओ।’
जेल वार्डन के हुक्म का पालन करते हुए हत्या के कई आरोपी बड़ी पुलिस लाइन के पास जमा हो गए जहाँ पर एक हथकड़ी के हथकंडे में दो आरोपियों की कलाइयाँ फंसा कर उनका गठबंधन करके गाड़ी के अंदर ठेल दिया । धीरे-धीरे  तीस – पैंतीस अपराधियों से गाड़ी ठसाठस भर गई।  गाड़ी का जालीदार दरवाजा बंद करके दो हथियारबंद हवलदार दरवाजे पर खड़े हो गए ।
  ‘अगर कोर्ट में किसी ने भी जज के सामने पुलिस के खिलाफ मुँह खोला तो यह मत भूलना कि तुम सब को वापस फिर इसी जेल में आना है….।’ वार्डन की हिदायत को सभी कैदियों ने चुपचाप सुन लिया और गाड़ी बांद्रा कोर्ट के लिए रवाना हो गई ।
    ‘चलो,  सभी चिल्लर  चिरकुट गांडू लोग छोटी वाली वैन में बैठ जाओ के आदेश का पालन करते हुए चिल्लर चिरकुट अपराधी ,जेबकतरा, छेड़खानी करने वाले मजनू, झोपड़पट्टी के दादा ,ऊंची सोसाइटी में पानी या गंदगी के लिये झगड़ने वाले,  ब्लू फिल्म बनाने वाले विशाल और अच्युतानंद के साथ करीब बारह – पंद्रह छोटे-मोटे अपराधियों को एक-एक की जोड़ी में दो अपराधियों की एक-एक कलाई को रुमाल से बांध दिया गया l बड़े अपराधियों के लिए लोहे की हथकड़ी और छोटे-मोटे चिल्लर  चिरकुटों के लिए कपड़े की हथकड़ी ।  म्युनिसिपल के कुत्ते पकड़ने वाली गाड़ी की तरह उस छोटी वैन में सभी को ठूस दिया गया जिसमें कुछ सीट पर बैठने की सुविधा पा गये और कुछ उकडूं मकडूं  बैठकर बांद्रा कोर्ट पहुँचकर अपने बदन को तनियाने की प्रतीक्षा करने  लगे । विशाल की दाँई कलाई  से एक शराबी के बाँयी कलाई के साथ बंधी थी जिस पर अपनी बीवी के साथ रोज मारपीट करने का आरोप उसकी बीवी ने लगाया था lउसके पसीने से शराब की बूं पसर रही थी ।  विशाल खिड़की की तरफ मुँह फेर कर बैठ गया।  विशाल ने महसूस किया आज बाहर चटक उजियारा है । लोग सड़कों पर ऐसे चल रहे हैं मानो कोई उत्सव में शामिल है । खिड़की के इस पार नरक की कोठरी में बैठे विशाल को खिड़की के उस पार की दुनिया किसी स्वर्ग नगरी की तरह लग रही थी।  वैन के साथ – साथ दौड़ रही मोटर बाइक पर एक जोड़ी को देखकर विशाल को कुसुम की याद आ गई । मयूरी रंग की साड़ी में साँवले बदन वाली कुसुम के जुड़े में मोगरे का गजरा ….उस गजरे की भीनी – भीनी सुगंध को  सूंघने के लिए वह तरस गया था ……मानों कई साल बीत गए हो ।  दो बार जेल में और एक बार अस्पताल में कुसुम विशाल से मिलने आई थी लेकिन जुड़े में मोगरे का गजरा नहीं था …..शायद वह गजरा सजाना भूल गई हो… लेकिन वह मोगरे के फुल की इतनी शौकीन है कि भूल से एक बार गजरा लगाना भले ही भूल जाए लेकिन दोबारा वह भूल नहीं सकती , वह भी तब जब  विशाल उसके सामने हो …..शायद वह मेरे दुख से दुखी थी इसलिए जुड़े में गजरा ना लगाया हो । गाढ़े काले रंग  रेशमी बाल का जुड़ा …..और बिना मोगरे का गजरा….. कितना अधूरा उतरा हुआ चेहरा लगता था कुसुम का। मोटर बाइक पर पीछे बैठी हुई लड़की का चेहरा खिला हुआ है I वह बात- बात में खिलखिला रही है ।उसने आगे बैठे हुए लड़के को अपनी बाहों के बंधन में इस तरह से जकड़ा हुआ है कि जैसे वह पारस हो जिसके स्पर्श से वह कुंदन की तरह निखर रही है।
     ‘और एक मैं हूँ जो अपनी कुसुम को इतना कष्ट दे रहा हूँ।  विशाल के मन में एक असहनीय पीड़ा की लहर उठी I साथ ही कंधे पर बोझ महसूस हुआ क्योंकि पास में बैठा शराबी उसके कंधे के सहारे गहरी नींद में झूल रहा है । विशाल ने बड़े ध्यान से शराबी को देखा उम्र यही कोई अठ्ठाईस – तीस  साल । बाल खिचड़ी। गाल और आँखें धंसी हुई । शरीर कंकाल सा । अपनी पत्नी के साथ जबरदस्त मारपीट का आरोप I पूरे चौदह  दिन तक पुलिसवालों ने खूब जमकर ठुकाई की थी । विशाल को याद आया कि गायकवाड इसी शराबी की मुँह में गोबर ठूंसकर चिल्लाया था, ‘मादर ……अगर आज के बाद कभी अपनी औरत पर हाथ उठाया तो साले तेरा संडास तेरे मुंह में ठूंस दूंगा।
चौदह दिनों तक पुलिस हिरासत में उसे शराब के दर्शन नहीं हुए थे लेकिन फिर भी बदन के पसीने से कच्ची शराब की बू का प्रवाह जारी था । ‘साला  पक्का बेवड़ा है।’   विशाल मन ही मन गरियाया,  “मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि औरत तो प्यार करने के लिए होती है, दिल के करीब रखने के लिए होती है तो कोई उस पर हाथ क्यों उठाता है ? वह कैसे लोग होते हैं जो औरतों पर हाथ उठाते हैं ? शायद वे प्यार को नहीं जानते ?”  पच्चीसों जूनियर एक्स्ट्रा लड़कियों को केवल जवानी और वासना के आवेश में चूसने वाला विशाल जब पहली बार कुसुम के आगोश में बंधा तो उसके शरीर से काम की सनसनाहट गायब हो गई थी । पहली बार कुसुम की आँखों में झांका तो मन में ख्याल आया कि कुसुम , जो मेरी है,  अभी मेरे साथ पलंग पर पड़ी है,  कुछ ही घंटे के बाद किसी और की हो जाएगी और इसी पलंग पर कोई और उसे चूसेगा जैसे वह वह मेकअप रूम में सौ – पचास  रूपये हवन करके दान भोग लगाया करता था । कुसुम के साथ पहली बार संभोग के उपरांत विशाल को पुरुष वीर्य का मतलब समझ में आया कि अपने जैसे ही जीव की उत्पत्ति करना,  उसे प्यार करना, अपना सुख- दु:ख बांटना, एक सार्थक एवं सुंदर जीवन प्रदान करना एक छोटा सा घर , एक प्यारा सा परिवार , तनाव रहित जीवन ……”क्या तुम मुझसे शादी करोगी?” दूसरी मुलाकात में ही विशाल ने कुसुम के सामने शादी का प्रस्ताव रखा था । तीसरी मुलाकात में पता चला कि कुसुम ने विशाल के अलावा और ग्राहकों के साथ हमबिस्तर होना त्याग दिया था । कई मुलाकातों के बाद एक दूसरे को अच्छी तरह से समझने- पररखने के बाद सागर की लहरों को साक्षी मानकर उन दोनों ने तय किया कि वर्तमान दिनचर्या का त्याग करके एक नई दुनिया बसाएंगे । विशाल स्ट्रगल छोड़ देगा और कुसुम अपनी वेश्यावृत्ति दोनों मुंबई छोड़ देंगे और दूर …..कहीं दूर…. अपनी प्यार की नगरी में एक नया इतिहास लिखेंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही दिखाना था।  चौदह दिन की रिमांड भगवान श्री राम के चौदह वर्ष वनवास के समान था । कारावास के पहले की जिंदगी और उसके बाद की जिंदगी ….. विशाल ने तय किया कि आने वाली जिंदगी में कुसुम उसके साथ होगी । उसकी मोटरबाइक पर उसे अपनी बाँहों में जकड़े….
     मटमैली धोती कुर्ते में लिपटे अच्युतानंद को जीवन में पहली बार फिल्म लाइन में कुछ कर गुजरने के निर्णय पर बेहद अफसोस की अनुभूति होने लगी l उनकी बाँई कलाई एक बीस साल के नवयुवक  की दाहिनी कलाई से बंधी थी  जिस पर बलात्कार की कोशिश का संगीन आरोप दर्ज था ।   “इतने बुरे दिन कि एक  पूजापाठी  पंडित…..चौदह दिन तक जेल में …..कोर्ट में पता नहीं और क्या हुज्जत हो …..लोग क्या कहेंगे उन्हें देखकर खूब  हंसेगे…. अपनी पत्नी ताई को मुँह कैसे दिखाएंगे जो उन्हें बार-बार यह समझाकर थक गई की फिल्मों में स्ट्रगल न करो …..लेकिन एक्टिंग का सिर पर ऐसा भूत सवार था कि उन्होंने किसी की एक नहीं सुनी अपने निर्णय पर इतने अटल थे कि…. इलाहाबाद में पी. सी. एस. , की परीक्षा में  प्रिलिमनरी एक्जाम पास करने के बावजूद …..मुंबई ….. तब की बंबई के लिए रवाना हो गये…..हीरो बनने का ख्वाब लेकर….. इलाहाबाद के  अमिताभ बच्चन की तरह…. अच्युतानंद भी इलाहाबाद की पहचान बनाने में जुटे रहे…. समय के चक्र में उलझते निकलते…..कभी आई.ए. एस. ,  पी. सी. एस . का छात्र ग्यारह रूपये पर गोदान कराने वाला पंडित बन गया….. प्रशासनिक सचिव , डी. एम. , कलेक्टर न बन कर बंबई  की खाक छाननेवाला स्ट्रगलर बन गया…. पिताजी ने उसके में लाखों रुपए दहेज लेकर धूमधाम के साथ बारात सजने की तैयारी की थी….. लेकिन ऐसा नालायक बेटा….. एक मराठीन  के साथ विवाह रचा लिया…… जाति भ्रष्ट हो गया ….. |
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        अच्युतानंदन ने जो चाहा वह कभी नहीं पाया… जो नहीं सोचा वही सामने आया …. उसने जेल के बारे में कभी सपने में भी नहीं सोचा था…. लेकिन चौदह वर्ष की समान चौदह दिन  का नरक कुंड कारावास …अब वह ताई की आज्ञा अनुसार ही सारा काम करेगा…. ताई चाहती है तो मैं फिल्म लाइन छोड़ दूंगा …. ताई की इच्छा है कि विशाल  भी इस लाइन को छोड़ दें और सुरेखा के साथ उसका लगीन हो जाए तो वह इसके लिए प्रयास करेगा कि किसी सेठ  से प्रार्थना करके विशाल की अच्छी नौकरी लगवा देगा….कन्यादान का पुण्य कमायेगा….. बची खुची जिंदगी चैन से गुजारेगा…. भाड़ में गई फिल्म लाइन ….भाड़ में गई स्ट्रगल…. इज्जत और सुकून की दो रोटी ही काफी है ….किस्मत में नहीं लिखा था कि अमिताभ बने….. न तो न सही ….जो है उसी में हर हाल खुश रहना है….. सामने विशाल बैठा है…. उसका भावी दमाद….. उसका परजांवाई …..सुरेखा का सुहाग…. हाय ….यह किस्मत का कैसा खेल है कि ससुर और दमाद ….दोनों स्टूगलर ….एक ही पुलिस वैन में सफर करके एक ही अपराध के आरोपी बनकर…. बांद्रा कोर्ट में हाजिर होने जा रहे हैं।
 धचाक के हिचकोले खाकर पुलिस वैन बांद्रा कोर्ट की सड़क पर खड़ी हो गई।  ” चलो …चलो…. चलो एक- एक करके लाइन में खड़े हो जाओ।”  हवलदार सभी आरोपियों के कंधे पकड़ – पकड़ कर सड़क के किनारे लाइन से खड़ा करने लगा । इसी सड़क पर कभी स्ट्रगलर थे ….और आज कैदी ….वक्त ने किया क्या हसीं सितम ।
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     शशांक और शब्बीर — दोनों माया नगरी के फिल्मी स्ट्रगलर ;  शशांक अभिनय के क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से हाथ पैर मार रहा है तो शब्बीर खान की दिली तमन्ना है कि उसके गीतों, गज़लों को कोई मशहूर संगीतकार उसकी धुन कंपोज करें और नामी गायक – गायिकाओं के स्वर में सधकर फिल्मी पर्दे पर गूंजे। शशांक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय में तीन वर्षीय डिप्लोमा करने के बाद तीन वर्ष तक रेपर्टरी का अनुभव लेकर बंबई फिल्म इंडस्ट्री में अपना एक मुकाम बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहा है । शब्बीर खान बंबई का  वाशिंदा है, जिसने उम्र के पंद्रह बसंत से  ही मोहब्बत ,बेवफाई, शबनम, अश्क, जुदाई, दिल, दिल्लगी, महबूबा, जांनिसार, जानेमन, रुसवाई जैसे उर्दू के सैकड़ों हरफों को मीटर में  बिठाकर गज़ल और शेरो शायरी  से अपनी कई डायरिया भर चुका है I बंबई में गुजर-बसर के लिए शशांक को हर महीने पोस्टमैन की राह जोहनी पड़ती है क्योंकि उसकी माँ देहरादून  के किसी विद्यालय में प्रिंसिपल हैं जो अपने होनहार पुत्र के सपने को पूरा करने के लिए तीन हजार रूपये का स्ट्रगल फंड भेजती  है । शब्बीर खान के माता-पिता बंबई के किसी दंगे में कुछ हिंदू उग्रवादियों द्वारा बलि चढ़ा दिए गए थे , जिसका अपनी इकलौती बहन के साथ कुर्ला की किसी झोपड़ीपट्टी में रैन बसेरा है । शशांक और शब्बीर कुमार दोनों दोस्त हैं। एक दूसरे का सुख- दुख बांटते हैं lस्ट्रगल करते हुए एक दूसरे को ऐसे लोगों से मिलाते हैं ,जो उनकी योग्यता को परख सकें प्रत्येक रविवार की शाम शब्बीर खान शशांक के आदर्श नगर वाले किराए के मकान में पहुँच जाता है।
       “आखिर ऐसे कब तक चलेगा ? मुखड़ा और अंतरा  मैं लिखूं और लिरिक्स राइटर में नाम उस साले का जाएगा ।”  शब्बीर अपने नाखून को दांतो से कुतरने लगा । मानसिक तनाव के समय गरद का दम मारना और अपने नाखून को दाँतों से कुतरने पर शब्बीर अपने आप को हल्का महसूस करता था ।आज गरद का हल्का सा सुट्टा वह दोपहर को ही मार चुका है।
     “ये सिलसिला तब तक चलता रहेगा  जब तक कोई म्यूजिक डायरेक्टर या फिल्म डायरेक्टर आपको स्वतंत्र रूप से गीत लिखने का मौका ना दें।”   शशांक ने कबाट को खोलकर उसमें अपने तह किए कपड़े को रखते हुए बोला , “क्या मुकद्दर है ?”  शब्बीर ने माथा  पीटा, “मैं मदहोश बीकानेरी को अब तक आठ  गीत लिख कर दे चुका  हूँ और वह सब के सब गीत उसने किसी ना किसी फिल्म में चिपका दिए । रात-रात भर सोच कर मुखड़ा और अंतरा मैं लिखूं और नाम जाएगा…. गीतकार मदहोश बीकानेरी।”  कहते – कहते उसका मुँह थूंक से भर आया । मुँह का स्वाद कड़वा हो गया और बाहर देखे बिना खिड़की से उसने थूक दिया ।
      ‘ माल भी तो छाप रहे हो बरखुरदार’,  कहते हुए शशांक ने उसके गाल पर चुटकी काटी ।
‘हां ,हां …क्यों नहीं…. एक गीत के पाँच सौ रूपये मिल रहे हैं और क्या बाबाजी का घंटा ।’  शब्बीर बेड पर से उठा और वाश बेसिन में जाकर मुँह धोने  लगा I शशांक ने रेफ्रिजरेटर में से ब्रेड और अमूल बटर का एक-एक पैकेट निकालकर इत्मीनान से पलंग पर बैठ कर नाश्ते की तैयारी करने लगा ।
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि, ‘शब्बीर मुँह पोछता हुआ ड्रेसिंग टेबल पर आ बैठ।  “अभी किसी को कोई मुखड़ा सुनाओ तो सामने ऐसा मुँह बिचकाएंगे मानो मेरा गीत सुनकर उस म्यूजिक डायरेक्टर या  फिल्म डायरेक्टर की नानी मर गई हो ….और दो, चार, छ्ह, महीने के बाद मेरे ही मुखड़े में थोड़ा हेरफेर कर के साले खुद गीतकार बन जाते हैं ।”  ड्रेसिंग टेबल का ड्रावर खोल कर वह कुछ ढूंढने लगा ।
   “क्या करोगे भाई …. कोई नहीं चाहता कि आप आसानी से अपनी मंजिल तक पहुँच जाएं।”   ब्रेड पर मक्खन लगाते हुए शशांक बोला ।
              “और बता,  तेरा क्या चल रहा है ?” अपने होठों पर लिपस्टिक की लाली लगाते हुए शब्बीर पूछ बैठा।
‘ अपना क्या …..मुर्गी की दौड़ कचरे तक …..बस लगे पड़े हैं इस बंबई में।’ कई ब्रेड पर मक्खन लगाने के बाद वह काले नमक और भुने जीरे का बुक्का  लाने रसोई घर में चला गया। शब्बीर किसी फिल्म की सीटी धुन बजाता हुआ आँखों में काजल लगाने लगा ।  दो मिनट तक कमरे में चुप्पी छाई रही । शब्बीर ने अपनी टी शर्ट निकाल कर लापरवाही से एक ओर फेंक दिया और कबाट में कपड़ों के ढेर में कुछ ढूंढने लगा।
‘ जब तक सही एप्रोच नहीं हो , तब तक स्ट्रगल करने का कोई फायदा नहीं।’  कहते हुए शशांक ने ब्रेड का एक टुकड़ा काट कर अपने मुँह में रखा और सामने देखा कि शब्बीर सफेद रंग का मखमली ब्रा पहन चुका है।
“तुम तो दिल्ली एन.एस.डी. रिटर्न हो बंधु, मैंने सुना है कि दिल्ली वालों के पास बहुत सोर्स और फोर्स होता है”, कहता हुआ शब्बीर शशांक  की ओर पीठ करके खड़ा हो गया । शशांक ब्रेड का एक टुकड़ा लेकर शब्बीर के  पास गया ।
‘ स्वाभिमान ….मेरे भाई …. स्वाभिमान,  किसी के सामने हाथ फैलाकर काम मांगते समय मुझे ईगो प्रॉब्लम होती है…. ईगो प्रॉब्लम ।’  ब्रेड का टुकड़ा शब्बीर के मुँह में डालकर शशांक ने उसके मखमली ब्रा के हुक कस दिया। गैरेज में काम करने के कारण शब्बीर की हथेलियों पर फफोले हैं बाकी शरीर गोरा और मुलायम है । शशांक ने शब्बीर की पीठ पर एक हल्का सा चुंबन जड़ दिया ।
‘अभी नहीं ।’ शब्बीर का बदन सिहर उठा ,  ‘पैंटी कहाँ रख देते हो तुम?’ शब्बीर अपनी पैंट और अंतर्वस्त्र निकालकर प्राकृतिक अवस्था में हो गया । शशांक ने कबाट में से एक सफेद मुलायम रोयेदार जनानी पैंटी निकाल कर दे दी । उसने शब्बीर का गाल चूमने के लिए  जैसे ही आगे बढ़ना चाहा  ‘हट, अभी नहीं’ लड़कियों की तरह कलाई घुमाकर शब्बीर दो कदम पीछे हट गया । पलंग पर बैठ कर शशांक शब्बीर को निहारने लगा । आँखों में काजल, बालों में पानी लगाकर बीच में सजाई माँग, होठों पर लाली,  चेहरे पर क्रीम और पाउडर, बदन पर ब्रा और पेंटी,  बिल्कुल लड़कियों की तरह कमनीय लगने के लिए शरीर के सभी रोएं  साफ ,  उभरे हुए उरोजोवाली ब्रा , हाफ कट पेंटी, शब्बीर ने आगे बढ़ने के लिए एक कदम जैसे ही बढ़ाया, कमर में ऐसी लचक की  सोलह साल की जन्मजात पतुरिया भी शरमा जाए , साक्षात  रति का प्रतिरूप लग रहा है शबीर ! प्रत्येक रविवार की  सांझ शशांक के लिए शब्बीर नारी रूप का नग्न सौन्दर्य धारण करके उसके आगोश में खो जाने के लिए विह्वल हो जाता है। शब्बीर हाथ में कैवेन्डर  परफ्यूम स्प्रे की शीशी लेकर आगे बढ़ा तो शशांक ने अपने शरीर के सारे कपड़े निकाल कर प्राकृतिक अवस्था में पलंग पर लेट गया । पास आकर  शब्बीर ने शीशी  का धक्कन खोलकर एक के बाद,  ऐसे कई फुहारों से अपने को और शशांक को भिगो दिया। पूरे कमरे में खुशबू पसर गयी । कामदेव के काममहल की शोभा  निखर आई,  जहाँ कामदेव और रति एक दूसरे में पूरी तरह से समा जाते हैं,  वासना की गहराइयों में डूब जाते हैं। इस समय शशांक  के सिर पर कामदेव और शब्बीर के ह्रदय में रती का प्यार उतर आया है । शशांक और शब्बीर ने एक दूसरे को अपनी बाहों में जकड़ कर अपने मधुर प्रेम से मदमस्त कर देनेवाले जीवन रस से सराबोर करने लगे ।  वासना की भावना अंधी होती है । एक बार उसकी सवारी निकल पड़े तो सभी मान – मर्यादा और नियम बंधन का महत्व गौण हो जाता है l स्त्री और पुरुष संभोग से काम तृप्त होते हैं परंतु समय पर एक दूसरे के पूरक शरीर के मिलन ना हो पाने पर कामुकता अपने ही समान वर्ग पर आतुर हो जाती है।  पुरुष पुरुष के साथ और स्त्री स्त्री के साथ हमबिस्तर होकर  काम आनंद का सुख भोगते है। परम आनंद के इस नश्वर क्षण में दोनों स्ट्रगलर ; शशांक और शब्बीर अपने अपने सारे मानसिक तनाव को भूलकर काम सुधा को तृप्त करने के लिए आतुर हैं। शब्बीर भूल गया है कि वह मुसलमान है और जो उसके होठों को चूम रहा है उसी के जात भाइयों ने दंगे में उसकी माता – पिता की जान ली थी । शशांक भी भूल गया कि देहरादून से बंबई के लिए विदा होते समय उसकी माँ ने सिर पर हाथ फेरकर कहा था,  “जीवन में आगे बढ़ना है तो भगवान श्री कृष्ण की गीता को नहीं भूलना , अपना चरित्र ऊँचा बनाये रखना और जब तक मंजिल न मिल जाए तब तक न हिम्मत हारना और न ही लंगोट ढीली करना।”
बंबइया फिल्म इंडस्ट्रि के दो धुरंधर स्ट्रगलर  इस वक्त एक दूसरे को प्यार कर रहे हैं । साइलेंस …..प्यार चालू है। भूख लगने पर इंसान को रोटी चाहिए। वासना भी एक भूख है । स्त्री को वासना की भूख सताये तो उसे हृष्ट पुष्ट मर्द चाहिए । पुरुष को वासना की भूख विह्वल करे तो उसे कोमलांगी नारी चाहिए I मर्यादा और  सुसंस्कार की बुनियाद पर खड़ा कोई भी समाज पेट की आग शांत करने के लिए रोटी का जुगाड़ कर सकता है परंतु काम की भूख को शांत करने के लिए विवाह के पहले स्त्री और पुरुष शारीरिक संबंधों को मान्यता नहीं देता । काम भावना प्रकृति प्रदत है । यह अपने समय के अनुकूल ही शरीर में जवानी का ज्वार भाटा लाता है काम विकृति और को रोकने के लिए ही विवाह जैसे सामाजिक संस्थाओं की स्थापना की गई । विवाह की वेदी पर पहुँचकर जीवन साथी बनने की सौगंध लेने से पहले ही ज्वार भाटा का सैलाब सभी सामाजिक मान- मर्यादा की सीमा को खंडित कर देता है । कभी-कभी स्त्री पुरुष  संयोग में कठिनाई है तो पुरुष पुरुष और स्त्री स्त्री को काम तृप्ति का अनुभव प्रदान करते हैं ।
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ग्लैमर की दुनिया में नाम और पैसे के लिए स्ट्रगल चलता रहता है । एक स्ट्रगलर का संघर्ष तब कष्टदायक हो जाता है, जब वह अपने पेट के लिए रोटी और सिरपर छत की जुगाड़ में दिन रात काम पाने के लिए मारा- मारा फिरता है I बड़ी मुश्किल से यदि कोई अच्छा ब्रेक मिल गया तो नंबर वन का ताज और राजशाही का तख्त पाने के लिए स्ट्रगल करना पड़ता है। ताज और तख्त पर कब्जा होने के बाद यदि कोई स्ट्रगल  करता है तो,  इतिहास गवाह है कि वह खोता चला जाता है । आज तक किसी भी विजेता को अक्षय विजय का वरदान नहीं मिला है । दूसरा पहलू यह है कि सब कुछ पाने के बाद खोना ही खोना है। बंबइया फिल्म इंडस्ट्री में एक कहावत है कि “दिल मिले या ना मिले , सब से हाथ मिलाते रहिए , क्योंकि यह कोई नहीं जानता कि कब कहाँ कैसे किसके नाम की लॉटरी खुल जाए।”  स्ट्रगल के दिनों में बहुत से निर्माता निर्देशकों ने, यहाँ तक कि कुछ अभिनेता और अभिनेत्रियों ने एक दुबले पतले लंबे अमिताभ बच्चन की खूब हंसी उड़ाई थी । लेकिन समय का चक्र बदला और वही अमिताभ बच्चन जिसकी आवाज को आकाशवाणी बंबई के अधिकारियों ने भोंडी और कर्कश कहकर उन्हें उद्‌घोषक के पद पर नियुक्त नहीं किया था, उसी भोंडी  कर्कश लेकिन भारी आवाज के मालिक अमिताभ बच्चन ने एक -दो नहीं ….पूरे पच्चीस साल तक, एक- दो नहीं ….लगभग पचासी फिल्मों में अपने बेमिसाल अभिनय के दम पर एंग्री यंग मैन सुपरस्टार बनकर इस स्टारडम में एकछत्र राज्य  किया। अमिताभ बच्चन इस फिल्मी दुनिया में अपना एक इतिहास बना गए।

   उनके संघर्ष के दिनों से प्रेरणा लेकर, एक दो नहीं बल्कि चालीस हजार स्ट्रगलर बंबई की सड़कों की खाक छान रहे हैं l प्रत्येक स्ट्रगलर को विश्वास है कि किस्मत अपनी चमकेगी, आज नहीं तो कल I आज के निर्माता-निर्देशक परोक्ष रूप से किसी स्ट्रगलर को अपमानित नहीं करते,  क्योंकि वह भी जानते हैं कि इन्हीं स्ट्रगलर में से कल कोई अमिताभ बनेगा ।
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बंबई के फिल्मों की फैक्ट्री है। तमिलनाडु के चेन्नई में भी  फिल्में बनती है … लेकिन केवल तमिल भाषा में। इसी तरह आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, गुजरात, राजस्थान , असम और पश्चिम बंगाल में पूरे वर्ष भर में औसतन पैंतालिस क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में बनती है जो बड़ी मुश्किल से लागत के साथ हैं कमा पाती है। तमिलनाडु में वर्ष भर में औसतन पचास से साठ फिल्में बनती है । तमिलभाषा की फिल्मों के सुपर हिट नायक – नायिकायों को वहाँ की जनता देवी-देवता का दर्जा देकर पूजती है। भगवान के मंदिरों की तरह उनके  सिनेमाघरों में स्टॉल और बालकनी  के अलावा पूरे तीन घंटे तक खड़े होकर स्टैंडिंग टिकट लेने  का रिवाज केवल तमिलनाडु में  प्रचलित है ।
यूरोप के हॉलीवुड के बाद बंबई का बॉलीवुड पूरी दुनिया में अपना नाम रखता है ।  हॉलीवुड फिल्मों के मुकाबले में बल्कि उनकी टक्कर में एक कदम आगे बढ़कर बंबई बॉलीवुड ने एक से बढ़कर एक ऐसी हजारों फिल्में बनाई है जो कनाडा , टोरंटो ,शिकांगो लंडन और फ्रांस के अलावा रूस तथा दुबई, पाकिस्तान के साथ – साथ श्रीलंका और नेपाल में लाखों-करोड़ों सीने  दर्शकों के दिल पर राज कर चुकी है । कई फिल्में तो दो-तीन महीनों तक वहाँ के सिनेमा घरों में भीड़ खींचने में कामयाब रही है।
प्रत्येक सप्ताह यहाँ कम से कम एक और ज्यादा से ज्यादा कई फिल्मों का मुहूर्त संपन्न होता है । एक वर्ष में लगभग पाँच सौ हिंदी फिल्में बनती है जिसमें से करीब सौ फिल्में किसी न किसी कारण से आधी अधूरी बनकर  डिब्बे में बंद हो जाती है । वर्ष में लगभग चार सौ फिल्में पूरे देश में प्रदर्शित होती है जिसमें से पंद्रह – बीस फिल्में सुपरहिट, सौ फिल्में सो-सो  हिट और बाकी फिल्म फ्लॉप हो जाती है । यह बंबई है …. इस बॉलीवुड में यहाँ रातों- रात रोडपति से करोड़पति और लखपति से दी द्ररिद्रपति बनने का खेल चलता रहता है बॉलीवुड के महान धुरंधर!!
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कल शुक्रवार को रश्मि की पहली फीचर फिल्म  “प्यार किया है खुल्लम-खुल्ला”  रिलीज होने वाली है जिसमें उसका हीरो है सुपर स्टार रोहित कुमार । रश्मि और रोहित की पहली मुलाकात ऍड फिल्म मेकर हैरी प्राश ने करवाई थी । रश्मि और रोहित की नजरें क्या मिली,  हैरी प्राश हाशिए पर चले गए ठीक वैसे ही जब हैरी ने रश्मि को साफ-साफ बता दिया था कि मेरी ऍड की शुटिंग सेट पर बिहारी नहीं दिखाई देना चाहिए । जिनकी उंगलियों को पकड़कर रश्मि ने फिल्म नगरी की गलियां छान मारी थी, उसी हमसफर को हैरी प्राश के कहने पर रश्मि ने बिहारी का दामन ऐसा छोड़ा जैसे लोग दूध में मक्खी को निकाल बाहर फेंकते है। हैरी प्राश अपने स्ट्रगल के दिनों के साथी, जो आज का सुपर स्टार  रोहित कुमार है, उसके सामने रश्मि को परोसकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता था, रोहित कुमार के अनुमोदन पर एक बड़ी फिल्म का निर्देशन करना चाहता था लेकिन उसके सपने सपने ही रह गए , सच नहीं हो पाए रोहित कुमार ने रश्मि के अनुरोध पर उसे अपनी दो फिल्मों में निर्देशक श्रीधर और बाबूखान  से कहकर हीरोइन साइन करवा लिया है । हैरी प्राश जहाँ के तहाँ रह गए,  ठीक बिहारी की तरह! बाबू खान द्वारा निर्देशित फिल्म ‘प्यार किया है खुल्लम-खुल्ला’  का प्रीमियर शो आज गुरुवार की रात नौ से बारह  मिनर्वा और टीवी चैनल के पत्रकारों को रश्मि से रूबरू करने के लिए आमंत्रित किया गया है। रश्मि आज बहुत खुश है । वह अपने माता- पिता और भाई के साथ प्रेस शो में जाने की तैयारी कर रही है ।
  ‘दीदी हम पाँच लोग मारुति कार में कैसे जाएंगे ?’  रश्मि का भाई रवि का इशारा माँ, बाप,  बहन और अपने को छोड़कर  पाँचवे शख्स के बारे में चिंतित है जो रश्मि का नौकर स्पॉट ब्वॉय कांचा चिना  है ।
  ‘वही तो मैं भी सोच रही हूँ ‘  रश्मि ने बालों को मशीन से ड्राई करते हुए कहा।  ‘कांचा चीना को ले जाना जरूरी है क्या ?’ रश्मि की माँ भी बोल उठी ।
‘जरूरी है मम्मी,  वहाँ फंक्शन में तो दीदी के साथ स्पॉट बॉय का होना जरूरी है ।’   रवि ने मजाक किया,  कांचा चिना के रहने से हमारा स्टेटस और बढ़ेगा ।’
रश्मि मंद मंद मुस्कुराने लगी । उसने इंटरकॉम फोन पर कांचा चीना को आदेश दिया  कि वह फिल्म निर्देशक बाबूखान से उसकी बात कराएं ।
    ‘रश्मि,  हम लोग मिनर्वा जाने के पहले प्रभादेवी चलेंगे वहाँ
श्री सिद्धिविनायक का दर्शन करके करने के बाद ही प्रेस शो  में जाएंगे।’   रश्मि की माँ  ने श्री गणेश जी का दर्शन करने की इच्छा जताई।
‘ ठीक है मम्मी , डैडी को बोलो जल्दी तैयार हो जाएं ।’  इंटरकॉम पर वीप की आवाज सुनकर रश्मि ने रिसीवर को कान से लगाया।
 ‘मॅडम , बेहूदा शा’ब  फोन पर है’  कांचा चिना ने नेपाली टोन में रश्मि को बताया।
‘ मैंने तुम्हें बाबूखान को फोन लगाने के लिए कहा था,  यह बेहूदा शा’ब कौन है ?’  रश्मि ने बनावटी गुस्से में फटकारा ।   ‘मॅडम , बाबूखान शा’ब  नहीं है । बेहूदा शा’ब बोले कि ‘आपसे बात करेंगे ‘  कांचा चिना घबराते हुए लरजती  आवाज में बोलने लगा ।
‘मैडम ,बाबूखान शा’ब का प्रोडक्शन कंट्रोलर ‘ कांचा ने उस व्यक्ति का पूरा परिचय दिया ।
बाबूखान का प्रोडक्शन कंट्रोलर सुनते ही रश्मि जोर से हंस पड़ी,  ‘कांचा चिना, दुनिया सुधर जाएगी लेकिन तुम नहीं सुधरोगे । अच्छे खासे देबूदा  बंगाली आदमी को तुम बार-बार बेहूदा बेहूदा बोलकर मुझे कंफ्यूज कर रहे हो।  ठीक है. मेरी बात करो कराओ उनसे।’ रश्मि के कहने पर कांचा ने लाइन क्लियर कर दी ।
रश्मि के  ‘हैलो’  कहते ही एक बुजुर्ग ने जोरदार नमस्कार का घोष किया।
    ‘देबूदा,  मेरी गाड़ी खराब हो गई है। आप टाटा सुमो अभी भेज दीजिएगा । रश्मि ने बड़े आदर के साथ आदेश दिया।
मैडम गाड़ी तो मैं भेज दूं लेकिन यहाँ कोई ड्राइवर नहीं है । आप अपने ड्राइवर सन्नी को भेज दें, गाड़ी ले जाए।’ देबूदा ने विनम्र निवेदन किया।
    ‘सन्नी को मेरी नौकरी छोड़े दो महीने हो गए हैं। ठीक है , मैं अपने भाई रवि को भेजती हूँ। ‘
फोन कट हो गया और रवि टाटा सुमो लाने के लिए बाबू खान के ऑफिस की ओर रवाना हो गया । लल्ली उर्फ सन्नी  दो महीना पहले  रश्मि की ड्राइवरी की नौकरी से त्यागपत्र देकर चला गया था। सन्नी की अनुपस्थिति में रश्मि का भाई रवि बहन का सारथी बना था ।
इटरकॉम पर वीप बज उठी । उधर से कांचा चिना की आवाज आई ,  ‘मैडम, आपसे भयंकर मैडम बात करना चाहती हैं ।’
भयंकर मैडम नाम सुनते ही रश्मि चीख पड़ी, ‘क्या?  मुझे पागल कर दोगे इडियट।  तुमसे कई बार कहा है कि भयंकर मैडम  नहीं ,  भावना मैडम नाम है उनका, नॉनसेंस ।’
‘दुबारा गलती की तो तुम्हे नेपाल भेज दूंगी ।  बात कराओ मेरी भावना से ।’  भावना रश्मि के अंतरंग सहेली है जिसे नेपाली स्पॉट बॉय  भयंकर मैडम का उच्चारण करके उनके नाम की ऐसी तैसी करता है।
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भीड़ कभी किसी के हालात नहीं बदल सकती । एक व्यक्ति,  केवल एक  व्यक्ति ही किसी की जिंदगी को नया आयाम दे सकता है l एक कहावत है ,  ” बनते बनते तकदीर बन जाती है और बिगड़ते बिगड़ते सफलता के आंकड़े ”  शिखर  के जीवन में डी. डी. राव उसके भाग्य विधाता बन कर आए ।  ‘हिन्द के बाशिंदे, और  तुम सब एक हो’  जैस सिरियलों में शिखर  के अभिनय से निर्माता-निर्देशक डी. डी. राव इतने प्रभावित हुए  कि वे उसे अपने बंगले पर मिलने के लिए बुलाने लगे I एक सड़क छाप  स्ट्रगलर के लिए यह बहुत बड़ी बात थी । शिखर की प्रार्थना पर डी. डी. राव ने निरंजन पागल की कहानी सुनी और ‘छक्का नंबर वन ‘  फिल्म बनाने की घोषणा की I  शिखर के व्यक्तित्व एवं उसकी अभिनय क्षमता से डी. डी. राव बहुत प्रभावित थे । सुरेश पिल्ले द्वारा निर्मित फिल्म ‘गरीब जिंदगी की अजीब दास्तान ‘ के ट्रायल शो में शिखर द्वारा अभिनीत एक लाचार शहरी का किरदार देखकर डी. डी. राव ने मन ही मन तय किया कि उनकी फिल्म ‘छक्का नंबर वन’ में मेन लीड रोल केवल शिखर ही करेगा ।जब शिखर को पता चला कि डी. डी. राव ने उसे चुनौतीपूर्ण रोल के लिए चुना है तो वह कृतज्ञ  होकर राव साहेब के चरणों में लोट गया I डी. डी. राव ने उसे उठाते हुए कहा , ‘मेरा मन कहता है कि इस रोल में तुम जान डाल दोगे।  ऐसा मौका सबको नहीं मिलता शिखर । पूरी स्क्रिप्ट को बहुत बारीकी से पढ़ो , कहानी एवं किरदारों की भावना को गहराई से समझने की कोशिश करो । तुम रोज शाम को जुहू चौपाटी के छक्कों के साथ मेल जोल करो । उनके उठने – बैठने और बोलने के अंदाज को पकड़ने की कोशिश करो । दो महीने बाद मैं स्टार्ट टू फिनीश शुटिंग की तैयारी कर रहा हूँ। डी. डी. राव के सीने से लगकर शिखर को लगा कि इस बंबई में ऐसे लोग भी है जो जन्म देने वाले माता-पिता से भी ज्यादा उदार और महान हो सकते हैं।
        ‘आपने मुझे इस लायक समझा है तो मैं भी आपकी कसौटी पर खरा उतरने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दूंगा ।’ शिखर ने मुट्ठी भींच कर बड़े दृढ़ विश्वास के साथ कुछ नया कर गुजरने के लिए बेताब होने लगा ।
    ‘अरे हाँ,  शिखर तुम एक काम करो डी. डी. राव कागजों के ढेर में कुछ ढूंढने लगे ,  ” परसों के. सी. कॉलेज, चर्चगेट में एक सेमिनार है जिसमें केंद्रीय सूचना प्रसार  मंत्री महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और सांस्कृतिक मंत्री आने वाले हैं । सेमिनार का विषय है कि “सिनेमा को उद्योग का दर्जा देने के लिए क्या-क्या उपाय करना चाहिए।” फिल्म इंडस्ट्री की तमाम बड़ी हस्तियां अपने अपने विचार पेश करेंगे । मैं चाहता हूँ  कि तुम मेरा एक लेख तैयार कर दो कुछ पॉइंट मैं देता हूँ और कुछ अपने हिसाब से सोच समझ कर एक पंद्रह  मिनट का पब्लिक स्पीच तैयार कर दो I”
     ‘ठीक है सर | मैं कल सुबह तक आपको  एक स्पीच तैयार करके देता हूँ । उसमें आप करेक्शन कर देंगे तो मैं फाइनल स्पीच तैयार करके शाम तक दे दूंगा।’
शिखर की तत्परता से डी. डी. राव बहुत प्रसन्न हुएI
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बंबई का सबसे महंगा और खूबसूरत उपनगर- बांद्रा ।  बांद्रा की ऊंची-ऊंची  इमारतों के बीच से गुजरती सड़क – लिंकिंग रोड I  दोपहर के एक बजे हैं और शुक्रवार का दिन  होने के कारण जुम्मे की नमाज की तैयारी मस्जिदों में हो रही है लेकिन नमाज पढ़ने वालों का हुजूम सड़कों पर मस्जिद की राह पकड़े हुए चले जा रहा है । बांद्रा – खार लिंकिंग रोड सिग्नल । लाल बत्ती के जलते ही बांद्रा से खार की तरफ दौड़ने वाली गाड़ियां एक के बाद एक खड़ी हो गई।  भूरी लाल रंग की  एक मर्सिडीज कार गाड़ियों की भीड़ में आकर सिग्नल के चालू होने का इंतजार करने लगी । मर्सिडीज कार की खिड़कियों पर सोनेरी रंग का शीशा चढ़ा हुआ है । इस अपारदर्शी शीशे पर अपना चेहरा तो देखा जा सकता है लेकिन कार के अंदर की दुनिया को देखना नामुमकिन । एक काली रंग की सुजुकी मोटरसाइकिल, जो खार से बांद्रा की ओर जा रही है, वह अपने ही पट्टी पर कार के बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गई । उस मोटरसाइकिल पर दो नवयुवक सवार हैं , जिन्होंने सिर पर हेलमेट और बदन पर चमड़े की जैकेट पहन रखी है । कार के पास मोटरसाइकिल के रुकते ही मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा नवयुवक बड़ी पूर्ति के साथ उतर कर इस पटरी से उस पटरी पर खड़ी कार के पास आ गया । दोनों गाड़ियों के बीच केवल तीन फीट का अंतर है और दोनों सड़कों को विभाजित करने वाली पत्थर की दीवार डिवायडर । बांद्रा से खार की ओर जाने वाली गाड़ियां खड़ी और खार से बांद्रा जाने वाली गाड़ियां बड़ी तेजी से दौड़ रही हैं केवल मोटर साइकिल को छोड़कर।  मोटर साइकिल  से उतरे युवक ने पलक झपकते ही सामने वाले शीशे पर कुछ चिपका दिया । उसने जेब से रिमोट कंट्रोलर निकालकर बटन दबाया कि कार का शिशा चरचरा बिखर गया । अब कार के अंदर का दृश्य बिल्कुल साफ नजर आने लगा । आगे की सीट पर एक बूढा ड्राइवर और उसके बगल में एक लंबा तगड़ा अधेड़ उम्र का व्यक्ति जिसके हाथ में मशीनगन है । शीशे के टुकड़े टुकड़े होते ही कार में बैठा अंगरक्षक कोई हरकत करता कि  पिछली सीट के दायी तरफ की खिड़की का शीशा रिमोट कंट्रोलर  की सहायता से मोटर साइकिल चला रहे युवक ने शीशे को चूर – चूर कर दिया। आगे का शीशा टूटते ही पिछली सीट पर बैठा व्यक्ति अपनी जान बचाने के लिए सीट के नीचे दुबक गया । बमुश्किल से पाँच सेकंड भी नहीं बीतने पाए कि कार के सामने और दायी तरफ से दोनों नवयुवक की हथेलियों में फंसी विदेशी रिवाल्वरों ने एक के बाद एक दनादन अनगिनत कारतूसों का शोला उगलना शुरू कर दिया । वातानुकूलित कार में पैर पर पैर फंसाकर  बैठा मशीनगन धारी  अंगरक्षक अचानक हुए हमले में बिना कोई ड्यूटी निभाये ठंडा हो गया । बूढ़ा ड्राइवर स्टेंरिंग पर  सिर रखकर ऐसे बैठा जैसे कि सो रहा हो । पिछली सीट के नीचे दुबका व्यक्ति कई गोलियों को अपने शरीर पर झेलने के बाद शांत हो गया । बीस सेकंड के बाद के भीतर दोनों नवयुवक  मोटरसाइकिल पर सवार होकर बांद्रा की तरफ दौड़ पड़े ।
 पाँच मिनट के भीतर पूरे इलाके में इस दिन दहाड़े हुई हत्या की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई । पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। इस तरह की हत्या बंबई में कोई नई बात नहीं थी लेकिन प्रत्येक हत्या के बाद शहर का माहौल कुछ गमगीन हो जाया करता है। पुलिस आई । कुछ शातिर गुंडे धरे गए । जाँच शुरू हुई । पंचनामा हुआ। नाकाबंदी हुई । सांझ को बंबई पुलिस मुख्यालय में  पुलिस कमिश्नर ने पत्रकारों को इस घटना के बारे में विशेष जानकारी दी । अगले दिन सुबह के सभी अखबार अपने पहले पेज पर इसी घटना को लटकाए हुए थे – उद्योगपति मंगरुभाई मेहता की दिनदहाड़े हत्या ।
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चौदह दिन की जेल यात्रा में पुलिसिया डंडे के करारी मार ने विशाल और अच्युतानंद को अंदर ही अंदर बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया । जेल की काल कोठरी में बिताए गए यातना के वे चौदह  दिन किसी भयानक विकराल सपने की तरह बीत गए । परंतु उस क्षण का स्मरण होते ही उन दोनों के रोंगटे खड़े हो जाते । विशाल और अच्युतानंद , दोनों की पहली जेल यात्रा थी I रशीद पर पक्का भरोसा रखकर उन दोनों ने उसकी योजना में अपना भरपूर योगदान दिया कि ब्लू फिल्म के लिए पार्टी पटाने के एवज में उन्हें पचास हजार रूपये मिलेंगे । एक ही बार में इतनी बड़ी रकम कमाने के लालच में देखते ही देखते दोनों रशीद भाई के षडयंत्र में बलि का बकरा बन गए I फिल्मी दुनिया में विशाल के पाँच वर्ष और अच्युतानंद के पच्चीस वर्ष का अनुभव कुछ काम नहीं आया और एक ही झटके में अपनी चिकनी चुपड़ी बोलबचन के भंवर में सबको फंसाकर रशीद खान फिल्म निर्माता बलजीत सिंह के नगद तीन लाख रुपए लेकर  रातों- रात इगतपुरी के होटल से चंपत हो गया । बलजीत सिंह को जब मालूम हुआ कि उनके साथ धोखा हुआ है तो उन्होंने पुलिस को एक नई स्टोरी सुनाई की रशीद, विशाल और अच्युतानंद ने उन्हें एक वीडियो एलबम  बनाने की योजना बता कर चोरी छुपे ब्लू फिल्म बनाने की कोशिश की । जब उन्होंने ब्लू फिल्म बनाने का विरोध किया तो रशीद खान उनके द्वारा दिए गए पाँच लाख रूपये लेकर गायब हो गया । चुकि इस योजना में विशाल और अच्युतानंद, रशीद खान के भागीदार है। इसलिए इन तीनों के  खिलाफ शिकायत दर्ज की । इसके पहले की विशाल और अच्युतानंद  अपने बचाव में कुछ कर पाते , पुलिस ने रातों-रात खार-डंडा की झोपड़ी से उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया। वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक गायकवाड ने मामले की गहरी छानबीन के लिए विशाल और अच्युतानंद को चौदह दिन के लिए पुलिस हिरासत में रखने का आदेश बांद्रा कोर्ट से प्राप्त करने में सफल हो गया । गबन के मामले की सच्चाई उगलवाने के लिए गायकवाड ने उन दोनों की पीठ पर इतने डंडे बरसाए कि सचमुच में उन्हें दिन में तारे दिखाई देने लगे।  माँ और बहन के नाम की भद्दी – भद्दी गालियां सुनकर विशाल का खून खोलने लगता लेकिन वक्त की चाल ने उसे ऐसी जगह ला पटका जहाँ आगे खाई थी और पीछे अंगार का पहाड़ !  मरता क्या न करता!! ‘मार – मार कर मुसलमान ‘ बनाने वाली बंबई पुलिस के डंडे, जूते खा-खा कर विशाल शारीरिक और मानसिक स्तर पर नष्ट भ्रष्ट हो गया।चिंता और भय के ज्वार भाटे ने उसके मन – मस्तिष्क को विक्षिप्त  कर दिया। डंडे की करारी मार के अतिरिक्त पानीदार दाल, ब्रेड के कुछ टुकड़े और स्वादहीन खिचड़ी ने विशाल की तंदरूस्त काया को कंकाल में बदल दिया । इसी दौरान उसे डिप्रेशन के दौरे पडे़ और पुलिस को मजबूरन उसे अस्पताल में इलाज के लिए दाखिल करवाना पड़ा l अस्पताल में उसे जेल की मार से छुट्टी तो मिल गई लेकिन विशाल को इस बात का पूरा अंदेशा था कि इस चक्रव्यूह से वह आसानी से नहीं निकल पाएगा। जब बांद्रा कोर्ट में उन दोनों को पुलिस ने न्यायाधीश महोदय के समक्ष पेश किया तो मामले की तह तक जाकर उन्होंने विशाल और अच्युतानंद को  जमानत पर छोड़ने के साथ-साथ रशीद को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने का आदेश दिया।
   इस घटना ने विशाल और अच्युतानंद के जीवन की दिशा मोड़ दी । पच्चीस वर्षों से कई फिल्मों में छोटा- मोटा रोल करके अपने अभिनय की खुजली मिटाने वाले अच्युतानंद ने अपनी बेटी सुरेखा के सिर पर हाथ रखकर सौगंध ली,  ‘आज के बाद निर्माता – निर्देशकों के आगे छोटे- बड़े रोल के लिए भीख मांगना तो दूर….. सपने में भी नहीं सोचेंगे कि उन्हें फिल्मों में काम करना है । आज के बाद स्ट्रगल बंद । फिल्मी मुहूर्त में पूजा पाठ करवाना बंद ।अपनी धर्मपत्नी की आज्ञा अनुसार फिल्मी लोगों से मिलना – जुलना बंद। पान-परचून की दुकान खोल कर अपने परिवार का पालन पोषण कर लेंगे , गैर फिल्मी लोगों के यहाँ भी पंडिताई पुरोहिती का धंधा बंद।’ अच्युतानंद की इस भीष्म प्रतिज्ञा से सबसे ज्यादा खुशी उनकी धर्मपत्नी ताई को हुई ,जो फैसला तुमने आज किया , यही फैसला तुम बहुत पहले कर लिया होता तो आज यह दिन ना देखने पड़ते!!!
  ‘अब चुप भी कर तू । जो हो गया सो हो गया ।’ अच्युतानंद को अपने इस फैसले पर संतोष है लेकिन वे नहीं चाहते कि कोई उनके अतीत के दिनों की पश्चाताप गाथा सुनाएं I
  ‘मैं विशाल को भी समझाऊंगी कि वह फिलीम लाइन छोड़ कर कोई छोटा – मोटा धंधा करें । धंधे में जो भी पैसा लगेगा वह मैं दूंगी उसको । बड़े गर्व के साथ ताई ने अपने मन की बात को कह डाला हालांकि वह इस बात को कई बार अच्युतानंद , विशाल और राज के सामने प्रकट कर चुकी थी।
   ‘वो सुरेखा से शादी के लिए तैयार होगा ?’  अच्युतानंद भी विशाल और सुरेखा को पति – पत्नी के रूप में देखना चाहते हैं लेकिन उनके मन में यह संदेह है कि कहीं विशाल शादी के लिए तैयार न हो ।
‘अरे ….क्यों नहीं तैयार होगा ? आखिर क्या खराबी है हमारे सुरेखा में? उसकी शादी के वास्ते एक नहीं….. हजार छोकरे मिल जाएंगे।’ ताई को भी अपनी लड़की पर नाज है।
‘ तो विशाल के साथ  ही सुरेखा की शादी क्यों नहीं करना चाहती हो ? अच्युतानंद के इस सवाल पर ताई ने वही पुराना राग अलापना शुरू कर दिया…… वो इसलिए विशाल हमारा जाना समझा है । राज भाऊ के यहाँ पिछले छः महीने  से मैं उसे देख रही हूँ। दिखने में अच्छा है I  व्यवहार में अच्छा है । तुम्हारी तरह उसकी अकल भी कहीं चरने नहीं गई है जो हीरो बनने के लिए फिल्म लाइन में झकमारी कर रहा है । लेकिन मेरे कहने पर अब  वो भी , ये क्या बोलते हैं तुम लोग ….स्ट्रगल….. हाँ,  स्ट्रगल करना छोड़ देगा । सुरेखा की शादी कहीं और करें तो पता नहीं कैसा छोकरा मिले ,  कैसा उसका घर बार मिले…. और हमारी एकच लड़की सुरेखा हमसे दूर हो जाएगी l विशाल के साथ लगीन करेंगे तो हम दोनों आँख के सामने रहेंगे ।”   ताई ने संतोष की सांस ली ।
अच्युतानंद ने भी मौन मेंअपना सिर हिला दिया कि ताई के विचार से वे सहमत है।
                                          ***
विशाल दिन भर पलंग पर पड़े – पड़े बोर हो जाता । राजजी दोपहर बारह एक बजे निकलते तो रात बारह एक बजे अपने कमरे पर लौटते । रात को जब अंग्रेजी शराब की तीखी गंध विशाल के नथुनों में प्रवेश करती तब उसकी आँखें खुल जाती क्योंकि विशाल दरवाजे को अंदर से बंद नहीं करता और राजजी  धीरे से दरवाजे को खोलकर भीतर आ जाते ।  राजजी में एक विशेषता यह है कि वह  चाहे जितनी शराब अपनी हलक के नीचे उतार ले,  बोलने और चलने के अंदाज में कोई लड़खड़ाहट नहीं आती ।  राजजी की उम्र विशाल  से दुगनी होगी लेकिन दोनों में पिछले पाँच वर्षों से मित्रता है । कई मौकों पर राजजी ने विशाल की मदद की थी जैसे आज उन्होंने उसे अपने घर में पनाह दी है । उसकी दवा दारू के लिए रोज-ब- रोज पच्चीस पचास रूपये दे रहे हैं। ताई विशाल को मदद करने के लिए कुछ पैसा देना चाहती है तो विशाल पैसा लेने से साफ इंकार कर देता  क्योंकि इससे उसकी स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है । राजजी से पैसे लेने में उसे कोई परहेज नहीं है क्योंकि फिल्मों में काम दिलाने के एवज में नए-नए स्ट्रगलरों से उन दोनों ने मिलकर पैसे ऐठे थे ।  पुलिस की मार ने विशाल को अंदर से एकदम खोखला कर दिया । उठते – बैठते समय उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा जाता । उसे प्यास तो बहुत लगती लेकिन पानी पीने को जी नहीं करता । विशाल का पेट धीरे – धीरे अंदर की ओर  जाने लगा और बदन पर हड्डियों की रेखाएं उभरने लगी । प्रतिदिन सर्दी जुकाम और बुखार की दवा खाते-खाते  वह ऊब गया लेकिन बीमारी ऐसी कि पीछा नहीं छोड़ रही । आईने में जब वह अपना चेहरा देखता तो उसे विश्वास नहीं होता कि क्या यह वही विशाल है जो पाँच साल पहले  बंबई में हीरो बनने आया था । गोरा तगड़ा हृष्ट पुष्ट  विशाल किसी टीबी के मरीज की तरह हो गया I क्या वह  इतना कमजोर है कि मात्र चौदह दिन के कारावास के कारण उसकी हालत इतनी  पतली हो गई । विशाल के दिमाग में एक तनाव हमेशा बना रहता,  कि रशीद के गिरफ्तार न होने पर पुलिस उसे और अच्युतानंद को पुनः परेशान करेगी I दिन में कई बार उसे कुसुम की याद  आती लेकिन अधिक कमजोरी एवं  हल्का बुखार होने के कारण वह जुहू तारा रोड स्थित होटल चट्टान के पीछे वाली झोपड़पट्टी में जाकर उससे मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता l कुसुम से संपर्क करने के लिए कोई उसका फोन भी नहीं था । कुसुम विशाल से मिलने के लिए खार – दांडा भी नहीं आ सकती क्योंकि राजजी के घर का पता नहीं जानती । विशाल कुसुम की कमी को बड़ी गहराई के साथ महसूस कर रहा था ।
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चर्चगेट ….. सांझ का समय….. के.सी. कॉलेज का हॉल …… फिल्मी दुनिया से जुड़े कई छोटी – बड़ी हस्तियाँ…. निर्माता, निर्देशक, कलाकार, तकनीशियन, एवं फिल्म वितरण का व्यापार करने वाले व्यवसायियों से खचाखच भरा हुआ है। मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्री के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और सांस्कृतिक मंत्री सहित कई जानी- मानी शख्सियत विराजमान है। आज के सेमिनार का मुख्य विषय है – ‘फिल्म इंडस्ट्री में बुनियादी सुधार के लिए आवश्यक कार्यक्रम ‘  इस मुद्दे पर सभी ने अपने अपने विचार प्रस्तुत किए । संचालक महोदय ने जब निर्माता-निर्देशक डी. डी. राव को अपने विचार व्यक्त करने के लिए मंच पर  आमंत्रित किया तो शिखर के मन में खुशी के लड्डू फूटने लगे क्योंकि डी. डी. राव द्वारा पढ़ा जानेवाला  भाषण उसी ने लिखा था । फिल्मी दुनिया में पिछले चार – पाँच वर्षों से लगातार स्ट्रगल करते हुए वह इतना परिपक्व हो गया कि इस इंडस्ट्री के सुधार के लिए क्या कुछ किया जाना चाहिए।
       तालियों की गड़गड़ाहट के बीच डी. डी. राव ने सभी सम्माननीय अतिथियों का स्वागत करते हुए अपना भाषण पढ़ना आरंभ किया,  “दादा साहेब फाल्के जिन्हें हम भारतीय फिल्म के पितामह का सम्मान देते हैं , उन्होंने सन् 1913 में ‘राजा हरिश्चंद्र’  फिल्म का सफल निर्माण करके भारत में सिनेमा की आधारशिला रखी । मूक फिल्मों से शुरू हुआ यह सफर बोलती फिल्म से रंगीन होकर सिनेमास्कोप का आकार  लेते हुए आज लेजर डिस्क और इंटरनेट तक पहुँच चुका है । तीस से पचास के दशक में दस- पंद्रह फिल्में बनती थी तो आज नब्बे के दशक में प्रतिवर्ष लगभग तीन सौ फिल्मों का निर्माण हो रहा है I अपनी सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को फिल्म मनोरंजन के माध्यम से आज दर्शकों तक पहुँचाने वाली यह जादूई तकनीक इतना विकसित हो चुकी है कि पश्चिमी देशों का हॉलीवुड हिंदुस्तान के बॉलीवुड का लोहा मानता है l अपनी कला साधना के द्वारा इस रचनात्मक क्षेत्र से करीब बीस लाख लोग जुड़े हुए हैं ।  छोटे-बड़े कुल मिलाकर साठ हजार सिनेमा घर है  जहाँ  हिंदी फिल्मों में के अलावा क्षेत्रीय भाषा एवं विदेशी फिल्मों का प्रदर्शन होता है । इन्हीं फिल्मों के द्वारा राज्य सरकारों के साथ-साथ केंद्र सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए मनोरंजन कर के रूप में प्राप्त करती है । तीन घंटे की फिल्म को वातानुकूलित सिनेमा घर में बैठ कर देखना जितना आसान है उससे सौ गुना अधिक कष्ट फिल्म निर्माण में है। फिल्म निर्माण के समय शुटिंग के पहले, शुटिंग के दौरान एवं प्रदर्शन से पहले व  बाद  में कम से कम सैकड़ों व्यक्तियों की युनिट एक टीम की तरह विभिन्न विभागों में सक्रिय रहती है । एक छोटी सी भूल या लापरवाही के कारण फिल्म -निर्माता को लाखों रूपये के नुकसान होने की आशंका रहती है । पिछले पचहत्तर वर्षों से हमारे देश में फिल्में बन रही है और आम और खास दर्शकों के लिए मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण साधन है।
सिनेमाघर  में बिकनेवाले प्रत्येक टिकट पर कुछ रकम ‘मनोरंजन कर ‘ के रूप में अंकित होती है। मनोरंजन कर की दर सभी प्रांतों में अलग-अलग प्रतिशत के हिसाब से वसूला जाता है। किसी राज्य में यह कर टिकट के मूल मूल्य से ही सौ प्रतिशत अधिक है तो कहीं कुछ कम । परिणामतः  सिनेमा टिकट के मूल्य में वृद्धि होने के कारण फिल्म देखने के पहले सिनेमा प्रेमी को कई बार सोचना पड़ता है । इस महंगाई में सिनेमा के टिकट अधिक महंगे होने के कारण फिल्म व्यवसाय के मुनाफे पर असर पड़ता है । अतः बेहतर यह होगा कि पूरे देश में समान रूप से एक व्यवहारिक उचित मनोरंजन कर निश्चित किया जाए ताकि  टिकटों के मूल्य में बेतहाशा वृद्धि न हो।
   हमारी फिल्म इंडस्ट्री को वीडियो पायरेसी के कारण अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है । कुछ अपराधी तत्व सिनेमाघरों में प्रदर्शित नई फिल्मों के वीडियो कैसेट बना कर बड़े पैमाने पर बाजार में उतार देते हैं । जिसके कारण सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़ कम होती जा रही है । केवल नेटवर्क पर नई फिल्मों का आनंद उठानेवाला निम्न एवं मध्यम वर्ग का दर्शक  सिनेमा हॉल तक पहुँचने की जहमत नहीं उठाता । इस गैरकानूनी धंधे के कारण निर्माता, वितरक और सिनेमाघर के मालिक को जबरदस्त घाटा उठाना पड़ता है। हालांकि सरकार ने इसे अपराध मानकर कुछ ठोस कानून बनाए हैं परंतु पुलिस की निष्क्रियता एवं मिलीभगत के कारण वीडियो पायरेसी का धंधा फल फुल  रहा है । इसलिए सरकार से मेरी प्रार्थना है कि   नई फिल्म के वीडियो कैसेट को गैरकानूनी ढंग से बनाकर बाजार में बेचना या केबल पर दिखाना गंभीर अपराध मानते हुए कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान बनाकर फिल्म उद्योग को इस संकट से बचाया जा सकता है । किसी शिकायत की प्रतीक्षा न करते हुए  जिम्मेदार व्यक्ति पर तुरत कार्रवाही करने की जिम्मेदारी पुलिस अधिकारियों पर होनी चाहिए। पुलिस की मदद के लिए हमारी फिल्म इंडस्ट्री उनके साथ है।
   शुटिंग के दौरान अक्सर छोटी -बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं । कभी-कभी सावधानी बरतने के बावजूद भयंकर दुर्घटनाएं हो जाती हैं । कैमरे के सामने काम करने वाले कलाकार या कैमरे के पीछे रहने वाले तकनीशियन या मजदूर इन दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं । अतः शुटिंग के दौरान कार्यरत सभी युनिट सदस्यों को जीवन बीमा होना चाहिए । इसके लिए फिल्म निर्माता को किसी बीमा कंपनी के साथ एक निश्चित समय, एकम एवं मुआबजा का समझौता करना चाहिए । यह समझौता फिल्म निर्माण बीमा कंपनी एवं यूनिट के सदस्यों के लिए लाभप्रद साबित होगा। अतः सभी के जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए शुटिंग के पहले आवश्यक बीमा शर्तों के पालन की अनिवार्यता होनी चाहिए । बीमा कंपनी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के इलाज का पूरा खर्च उठाएं।
  फिल्म व्यवसाय में कालेधन की भरमार है । अतः बैंकों से कर्ज लेकर फिल्म बनाने वाली योजना में कोई दम नहीं है । सरकार को चाहिए कि किसी उद्योग में काला पैसा लगाने वालों पर निगाह रखने की जिम्मेदारी किसी विशेष जांच एजेंसी को सौंपे। काले पैसे के बहाव को रोकने के लिए फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अपराध प्रवृति के लोगों के प्रवेश को रोकने की आवश्यकता है । इसी के साथ इस फिल्म वालों को प्रतिज्ञाबद्ध होना चाहिए कि तस्कर एवं काला धन कमाने वाले व्यापारियों से कोई आर्थिक मदद लेकर हम उनके गुलाम न बने । यदि एक बार सफेद  पैसों के बल पर साफ-सुथरी फिल्मों के निर्माण का कार्य होने लगे तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी फिल्म इंडस्ट्री को आर्थिक तंगी के दौर से न गुजरना पड़ेगा।
   अनेक प्रांतों में जहाँ प्राकृतिक नैसर्गिक सुंदरता से परिपूर्ण रमणीय पर्यटन स्थल है , वहाँ बंबई के फिल्म सिटी स्टूडियों की तरह सरकारी स्टूडियों बनाए जाने की जरूरत पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है | यातायात,  होटल एवं शुटिंग उपकरणों में विशेष रियायत देकर स्विट्जरलैंड, मॉरीशस और यूरोप जाने वाले फिल्म निर्माताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों  के साथ-साथ केंद्र सरकार की भी होनी चाहिए । ऐसे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार यदि सकारात्मक पहल करें तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा बॉलीवुड केवल हॉलीवुड से टक्कर ही नहीं बल्कि उससे भी दो कदम आगे बढ़कर इक्कीसवी शताब्दी में भारत का नाम और भी गौरवान्वित करेगा। इसी अनुरोध के साथ आप सब का आभार मानते हुए मैं अपना भाषण समाप्त करता है।’
  तमिलभाषी निर्देशक डी. डी. राव के मुख से हिंदी भाषण सुनकर सभी वाह-वाह कर उठे । उनके सम्मान में तालियों की जोरदार कड़कड़ाहट के बीच  में केंद्रीय मंत्री ने वादा किया कि वे संसद के अगले सत्र में डी. डी. राव के मुद्दों को लोकसभा में विचार-विमर्श के लिए रखेंगे |
    शिखर की छाती में हवा भर आया कि उसके लिखे भाषण की चर्चा दिल्ली के लोकसभा में होगी लेकिन सभी डी. डी. राव की प्रशंसा में लगे हुए थे । कोई नहीं जानता कि उस भाषण को शिखर ने लिखा है। खैर…. शिखर खुश है ।
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स्ट्रगलर और उसका स्ट्रगल ….. मन में एक आस है कि कभी न कभी अपनी बात भी बनेगी जैसे अमिताभ बच्चन ,मिथुन चक्रवर्ती, धर्मेंद्र, मनोज कुमार जैसों ने बड़े-बड़े स्ट्रगल के बाद अपनी मंजिल पाने में सफल हो गए । शरद कपूर के छ:  साल बाद और मनोज बाजपेई को स्टारडम में अपनी पहचान बनाने में चौदह साल लग गए । लेकिन सबकी तकदीर में ऐसी सफलता नहीं लिखी होती । प्रकाश मेहरा , लारेंस डिसूजा, अशोक मेहता जैसे आज के नामी  निर्देशक, कैमरामैन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन वह इस फिल्मी दुनिया में अपनी इतिहास लिखेंगे । स्ट्रगल तो हर किसी को करना पड़ता है । कुछ लोग भरे पेट संघर्ष करते हैं तो कुछ लोग खाली पेट। लेकिन एक बात पक्की है कि स्ट्रगल के दिनों में बहुत पापड़ बेलने पड़ते है ।भयंकर पीड़ा भोगनी पड़ती है । सामाजिक उपहास झेलना पड़ता है । एक बार जो यहाँ आ गया वह वापस नहीं लौट  पाता । यदि वापस लौटा भी तो वह काम का आदमी नहीं रह जाता । फिल्मी दुनिया में असफलता का कड़वा घूंट पीकर लौटा स्ट्रगलर और सीमा पर पीठ पर गोलियां खाकर भाग आया सैनिक इन दोनों की समाज में कोई इज्जत नहीं होती है । स्ट्रगलर हो या सैनिक , अगर अपना लक्ष्य तय कर लिया तो उसकी प्राप्ति के लिए आपको लड़ाई लड़नी होगी l बीच लड़ाई में मैदान छोड़कर भागने वाला भगोड़ा सैनिक और फ्रस्टेड स्ट्गलर  का जीवन पेड़ के उस ठूंठ लकड़ी की तरह होता है  जिसपर न कोपल  अंकुरित होते है और नहीं जलाने के काम आता है। इसलिए बहुत सोच-समझकर फिल्म या फौज में भर्ती होने का निर्णय लेना चाहिए I जो लोग बिना सोचे समझे एक कदम आगे बढ़ाते हैं तो समझो कि उनका दूसरा कदम दलदल में ही पड़ने वाला है ।
दुख कॉमन है ! दुख के कारण हजार!! सबका अपना -अपना दुख है। क्यों है ? कब है?   क्या उपचार है?  नाना प्रकार के उत्तर आपको दुखियों के मुख से सुनने को मिलेंगे। किसी की शादी नहीं हो रही है तो वह दुखी है । किसी की शादी हो गई और चरित्रहीन दुष्टा स्त्री मिल गई तो वह दुखी है। सब कुछ बराबर है तो दहेज में हुई कोई फरेबी के कारण वह दुखी है । कहीं सास बहू से तो कहीं बहू अपनी सास से दुखी है।  कोई पुत्र हीन हो तो दुखी है ।किसी को  मानसिक विकलांग पुत्र की प्राप्ति हुई है तो दुखी है । किसी को पुत्र देकर काल ने उसे  उससे छीन लिया तो दुखी है । सब कुछ ठीक है तो पुत्र नालायक है या माता-पिता के नियंत्रण से बाहर है तो दुखी है । कमाई धमाई ठीक नहीं तो दुखी है । जिनके पास अकूत धन है तो सरकार की निगाह में से बचाए रखने में परेशान है ,और यही परेशानी उसके दुख का कारण है । कोई अपने वर्तमान से असंतुष्ट है, तो दुखी है तो कोई भावी भविष्य के अंधकार के भय से दुखी है । किसी का भाई , भाई न होकर कसाई है और उससे अलग होने के लिए दुखी है । तो कोई अपने सिर से पिता का साया उठ जाने के कारण दुखी है । कोई दिल की बीमारी से दुखी है तो कोई भरी जवानी में सिर के काले बालों के अंधाधुंध झड़ने से दुखी है । चना है लेकिन दांत न होने के कारण दुखी है ,तो कोई दांत है लेकिन सड़ने और पायरिया के दर्द से दुखी है। मंदिर में दर्शनार्थियों  की भीड़ है और उनकी प्रार्थना -अर्चना सुन – सुन कर भगवान दुखी है तो सत्यनारायण की महापूजा सुनने के बाद पर्याप्त दक्षिणा न मिलने पर पंडित दुखी है । कोई शराब के लिए मोहताज है तो कोई शराब के में सबकुछ डुबोकर दुखी है । दुख का अस्तित्व वायु की तरह है जो  सर्वत्र व्याप्त है । हवा को न किसी ने देखा,  न स्पर्श किया हम केवल महसूस करते हैं l ठीक उसी तरह दुख को हम महसूस करते हैं ।
              आजकल रश्मि भी दुखी है क्योंकि उसकी पहली फिल्म   ‘प्यार करेंगे खुल्लम खुल्ला’  बुरी तरह से फ्लॉप हो गई है l  रोहित कुमार जैसा सुपर स्टार भी इस फिल्म को वैतरणी पार नहीं करा पाया। विशाल दुखी है क्योंकि जेल से छुटने के  वह दिन -व-दिन कमजोर होने लगा । बिहारी दिशाहीन हो कर यहाँ वहाँ भटक रहा है । रशीद भाई  पुलिस की नज़र और गिरफ्त से बचने के लिए यायावरी की जिंदगी से दुखी है । फिल्म पत्रकार राजजी  अपना कोई परिवार न होने के कारण बढ़ती उम्र में अकेलेपन से दुखी हैं। इस्माइल अपनी बेकारी से दुखी है । एन. एस. डी रिटर्न्स शशांक को सही ब्रेक न मिलने के कारण दुखी है । एक शिखर ही ऐसा है जिसके आस पास दुख का डेरा नहीं है । वह बहुत खुश है क्योंकि उसकी फिल्म  ‘गरीब जिंदगी की अजीब दास्तान’ के निर्माता सुरेश पील्ले और निर्देशक चैतन्य श्री अपनी फिल्म को फ्रांस के फिल्म महोत्सव में अवलोकन के लिए भेजने की तैयारी कर रहे हैं । पटियाला से आया हुआ एक नौजवान योगीराज दादर स्टेशन पर खड़ा -खड़ा दुखी हो रहा है कि वह अपना फिल्म स्ट्रगल कहाँ से शुरू करें।
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नाई की गलती या उसकी भूल से बंदर के हाथ अगर उस्तरा लग जाए तो….। बंदर के हाथ उस्तरा !! यह संयोग बंदर के लिए बड़ी हास्यास्पद होगी और मोहल्ले वालों के लिए दुखद । दाढ़ी बनाए जाने वाले उस्तरा को बंदर अपनी बुद्धि के हिसाब से उपयोग करेगा । इस उपयोग में उसकी उंगली कट सकती है ,नाक भी कट सकती है। यदि किसी व्यक्ति ने उसे चिढ़ाया – खिझाया  तो बंदर उस्तरा फेंक  कर मारेगा और उस व्यक्ति का सिर भी फूट सकता है । बंदर के हाथ में यदि उस्तरा है तो कुछ भी हो सकता है । नाई  एक बार भूल या लापरवाही कर सकता है लेकिन इस दुनिया को बनाने वाला परमात्मा , कभी किसी भी व्यक्ति को उसकी योग्यता,  प्रतिभा शिक्षा से अधिक अधिकार नहीं देते।….. अन्यथा यह अधिकार उस व्यक्ति के लिए बंदर के हाथ में उस्तरा की तरह घातक होगी । इंजीनियरिंग कॉलेज में हजारों लाखों विद्यार्थी पढ़ते है लेकिन सभी तो इंजीनियर नहीं बन जाते । डॉक्टरी पास करने वाले सभी छात्र एम. डी. और एम. बी. बी. एस. ही नहीं होते बल्कि कुछ  नेत्र विशेषज्ञ होते हैं, कुछ हड्डी विशेषज्ञ होते हैं, कुछ भगंदर बावासीर के इलाज में माहिर  होते है। इसी तरह बंबईया फिल्म इंडस्ट्री में स्ट्रगल करने वाला स्ट्रगलर हीरों नहीं बन पाता । कुछ सुपर स्टार बनते हैं तो कुछ केवल कलाकार । कोई लेखक बन जाता है तो कोई कैमरामैन । कोई किसी का सेक्रेटरी बन जाता है तो कोई किसी का मेकअप मैन,  ड्रेस मैन या स्पॉटबॉय। कोई जूनियर आर्टिस्ट सप्लाई करने का धंधा करता है तो कोई लड़किययाँ सप्लाई करने का गोरखधंधा । अपनी किस्मत और योग्यता के बल पर प्रत्येक स्ट्रगलर किसी न किसी खाचे में अपने आप को फिट कर लेता है । वो स्ट्रगलर कायर होते हैं जो निराश होकर बंबई  छोड़ देते हैं और तो कुछ स्ट्रगलर अभागे होते हैं जो जहर खाकर या लोकल ट्रेन के नीचे कटकर अपनी स्ट्रगल लाइफ को समाप्त कर देते हैं ।  हालांकि ऐसे कायर और  भागे स्ट्रगलरों की  संख्या बहुत कम है।  एक कहावत है कि  “जो बंबई में कुछ नहीं कर पाया, समझलो वह दुनिया के किसी भी कोने में सफल नहीं हो सकता।”  जो बंबई में कुछ करने लगा तो मुंबई की परिधि से बाहर नहीं निकल सकता । यह बंबई…. चमत्कारी नगरी ……माया की नगरी …. बंबई में जो कुछ भी चकाचौंध है तो केवल फिल्म इंडस्ट्री की वजह । अगर कोई फिल्मी चक्कर को इस शहर से निकाल कर अलग कर दे तो क्या बचेगा आमची बंबई…..?
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बंबई के सबसे बड़े हीरा व्यापारी सेठ छगनलाल भाई की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई । प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ताड़देव ए. सी. मार्केट स्थित अपने कार्यालय में जाने के लिए छगनलाल भाई जैसे ही अपनी टाटा सफारी गाड़ी से उतरे, उनके बगल में गुजरती मोटर बाइक पर बैठे दो हेलमेट धारी सवारों ने अपनी माउजर पिस्टल से उन पर धड़ाधड़ नौ- राउंड  गोलियां चलाकर नौ दो ग्यारह हो गए । पंद्रह मिनट बाद पुलिस आयी और उन्हें आनन-फानन में नजदीक के किसी अस्पताल में ले जाने के पहले ही मौत हो गई । पूरे शहर में नाकाबंदी कर दी गई। मोटर बाइक लावारिस हालत में महालक्ष्मी सिग्नल के पास मिली।  शहर में इस तरह की यह दूसरी बारदात थी ।इसके पहले एक उद्योगपति की खार सिग्नल के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।  पूरे शहर में दहशत का माहौल व्याप्त हो गया । पुलिस अपराधियों का सुराग पाने के लिए हाथ पैर- मारने लगी । एक बात स्पष्ट थी यह दोनों हत्याएं कुछ नामी गुंडों द्वारा मांगी गई हफ्ता की बड़ी रकम अदा न करने के कारण की गई थी । दोनों हत्याओं में मोटर बाइक का इस्तेमाल किया गया था और उस पर सवार है दो हेलमेट धारियों ने माऊजर पिस्टल से अंधाधुंध गोली चला कर फरार हो गए। उन अपराधियों की खोज जारी है।

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विशाल की तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ने लगी । ताई उसके  दवा- दारू के लिए खुले मन से खर्च करने लगी कि उसका स्वास्थ्य जल्द से जल्द सुधर जाए  । घर में बैठे-बैठे विशाल जब बोर हो जाता तो उसका मन कुसुम से मिलने के लिए व्याकुल हो उठता । वह जुहू तारा रोड से समुद्र के किनारे – किनारे चलता हुआ होटल चट्टान के पीछे वाली झोपड़पट्टी तक पहुँचता । मुश्किल से तीन किलोमीटर की दूरी उसे तीन जन्म की यात्रा लगती l उसका दम फूलने लगता है। शारीरिक कमजोरी के कारण उसका सिर चकराने लगता है । शरीर में कहीं-कहीं उभर आई  छोटे-छोटे दानों में कुनकुनाहट होने लगती तो  खुजलाते – खुजलाते खून की बुंदे  रिस आती । वैसे भी अब कुसुम के पास आकर उसका मन शांत नहीं हो पाता । कितनी जल्दी कुसुम के पास से हट कर कहीं दूर चले जाने की बेचैनी उस के मन में हिलोरे पैदा करने लगती । विशाल ने महसूस किया कि धीरे  – धीरे अब उसकी दिलचस्पी कम होने लगी है । सुरेखा को सामने देखता तो उसके मन में श्रद्धा भावना हिलोरे मारने लगती । सुरेखा का कुंदन – सा बदन उसे किसी देवी की काया सी लगती जिसके सम्मुख सिर झुकाने से पुण्य की प्राप्ति होती है । एक दिन राजजी के घर में ताई के लिए उनके किसी रिश्तेदार का फोन आया था , वह ताई को बुलाने घर गया तो देखा कि  अधखुले दरवाजे के पीछे पर्दे के आड़ में सुरेखा अपने कपड़े बदल रही है । ऐसे मौके विशाल की जिंदगी में कई बार आए थे । फिल्म स्टूडियों के मेकअप रूम में कपड़े बदलती हीरोइन या जुनियर आर्टिस्ट अथवा वह  बंबई में सिर छुपाने के लिए जहाँ जहाँ जिसके जिसके घर आश्रय लिया हो वहाँ कपड़े बदलती हुई उनकी बहन, नये कपड़े से ढकनेवाली स्त्री और उसकी अदा को विशाल चोरी छिपे  देखने में माहिर था । ऐसे समय उसके बदन में करंट प्रवाहित होने लगता था । उसकी आँखों में सौ बोतल शराब का नशा छा जाता I टांगो की पिंडली कांपने लगती और होंठ सूख जाते लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं हुआ । दरवाजे की आड़ से देखा कि अधनंगी सुरेखा उसकी सलवार कमीज को पढ़ने में तल्लीन है,  मुश्किल से पंद्रह सेकंड के बाद विशाल ने अपनी नजरें फेर ली । उसने कान पकड़कर मन ही मन कुछ बुदबुदाया और  दूसरों की नजरें चुराकर अपनी दाईं हथेली पर थुककर फिर चाट लिया । मानो वह किसी पाप का प्रायश्चित कर रहा हो। मन अशांत होता तो कुसुम के पास पहुँचता लेकिन मन ही मन वह अपने को गरियाता  कि यहाँ क्यों आया ? सद्भाव या प्रेमवश विशाल को सांत्वना देने के इरादे से कुसुम उसे अपनी बाहों में भरने की कोशिश करती तो वह बिदकर दूर  जा बैठता । कुसुम की बाहों में उसका दम घुटने लगता। विशाल की बाहों में ना इतनी शक्ति थी और न हृदय में प्यार कि वह कुसुम के साथ मस्ती करता ,ठिठोली करता ।घंटे दो घंटे वरसोवा, अंधेरी या बांद्रा के सागर तट पर बैठा विशाल एक टक क्षितिज को निहारता । फिल्म पत्रकार राजजी , ताई का परिवार और कुसुम के अतिरिक्त किसी से नहीं मिलता । डॉक्टर की दवाई नियमित सेवन कर रहा था लेकिन आराम एक पैसे का नहीं । विशाल के जीवन में भयंकर साढ़ेसाती के प्रकोप का आरंभ हो चुका था ।
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   शाम सात बजे के बाद बंबई के बीयर बारों में धूम मची रहती है l बीयर बार ही क्या , चाहे कच्ची शराब का अड्डा हो या गाँव की ठर्रा की दुकान, फैमिली परमिट रूम हो या थ्रीस्टार -फाइवस्टार होटल का पब अपनी – अपनी हैसियत के हिसाब से पीने वाले अपने मनपसंद मयखाने में थोड़ा सा रूमानी होने के लिए पहुँच जाते हैं । कुछ गम गरक करने के लिए आते हैं तो कुछ मौज मस्ती में अपनी शाम गुजारने के लिए । वैसे बंबई फिल्म इंडस्ट्री में एक कहावत है कि  ‘रात नौ बजे के बाद सभी की घंटी बज जाती है’  घंटी बजने का मतलब है शराब की तलब लगना । यह बात शायद ही झूठ हो कि फिल्मी दुनिया में किसी ना किसी रूप में पैसा कमाने वाले में पंचानबे प्रतिशत लोग शराब के शौकीन होते हैं। यह बात अलग है कि कुछ लोग रोजाना अपना गला तर करते हैं तो कुछ सप्ताह में एक बार,  कुछ लोग दूसरों के पैसे से पीने की जुगाड़ में रहते हैं तो कुछ लोग चोरी छिपे अकेले-अकेले । सिर्फ पाँच प्रतिशत लोगों की रात नौ बजे के बाद घंटी नहीं बजती । बड़ी-बड़ी फिल्मों की योजना किसी होटल में या घर में ड्रिंक के दौरान ही बनती है I फिल्म लेखक शराब की तरंग में उत्साहित होकर कहानी के नये -.नये फ्लॉट सोचता है। शुटिंग में थके हुए लोग , युनिट में स्पॉट बॉय से लेकर प्रोड्यूसर तक पैकअप के बाद अपनी-अपनी महफिल जाम से जाम टकराने पहुँच जाते हैं।
पटियाला से बंबई पहुँचा हुआ नौजवान योगीराज गायक बनने के लिए स्टूडियों और निर्माता – निर्देशकों से मिलने के लिए झख मार रहा था कि किसी ने उसे सलाह दी कि सांताक्रुज के  “होटल सवेरा”  में एक अच्छे सिंगर की जरूरत है । होटल मैनेजर से मिलने पर पता चला कि प्रतिदिन शाम सात बजे से रात बारह बजे तक नाचने गाने के पाँच सौ रूपये मिलेंगे । योगीराज की मानो लॉटरी खुल गई । उसके लिए पाँच सौ रूपये वह भी पाँच घंटे में कमाना बहुत ही बड़ी उपलब्धि थी । उसे यह सौदा  बुरा नहीं लगा और उसने हामी भर दी।
    आज बार में वह उसका पहला दिन है । मैनेजर ने उसे कोई भड़कता हुआ गीत सुनाने के लिए कहा । योगीराज बाजा बजाने वाले को बता दिया कि वह कौन सा गीत सुनाएगा ।सभी बाजावाले वाह-वाह करने लगे । गाने की म्यूजिक बजी नहीं की बीयर बार में बैठे सभी शराबियों ने ताली बजाकर योगीराज का जोरदार स्वागत किया। बंबई में योगीराज को अपनी गाना सुनाने का पहला अवसर मिला था । इसके पहले उसने पटियाला में अपने यार- दोस्तों को कॉलेज,  स्कूल या छोटे-छोटे फंक्शन में  मोहम्मद रफी,  किशोर कुमार, कुंदन सहगल और शब्बीर कुमार की आवाज में सैकड़ों गाने सुनाकर वाह वाही बटोरी थी । माइक को हाथ में लेकर योगीराज ने कुछ पल के लिए आँखें बंद कर अपनी प्यारी माँ को स्मरण किया और संगीत की बीट पर लय- ताल बिठाते हुए गाना शुरू किया ,  “मेहबूबा , मेहबूबा, मेहबूबा, मेहबूबा ….. गुलशन में गुल खिलते है , जब सेहरा में मिलते हैं…..  मैं और तूऽऽऽ….. यह गाना खतम होते ही  “वंस मोर”  “वंस मोर”  की फरमाईश होने लगी। योगीराज की बांछे खिल गई। अनजाने शहर में, अजनबी लोगों की भीड़ में अपनी कला के प्रति उन सबके मुँह से तारीफ़ सुनकर योगीराज भी अपने रौ में आ गया। एक के बाद एक , ऐसे न जाने कितने गीत सुनाकर उसने महफ़िल की शान में चार चाँद लगा दिया।  “सबेरा होटल” की  परमिट रूम में आज योगीराज की रंगीन शाम बिल्कुल मदहोश थी ।
  आगाज़ तो बढ़िया है, अंजाम खुदा जाने।
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ऐसे व्यक्ति जो भाग्यवादी होते हैं , वह हथेली की लकीर एवं जन्म- कुंडली के आंकड़ों में अंधविश्वास रखते हैं। ऐसे लोग ऊपर वाले की दया पर निर्भर रहते हैं लेकिन वह लोग जो आशावादी होते हैं, ऐसे कर्मवादी कर्मठ पुरुष निष्काम भाव से कर्म करना चाहते हैं,  अपने हाथों की कलाइयों के मजबूती के बल पर मैदान में बाजी मारने की फिराक में रहते हैं । सफल होने के लिए भाग्यशाली होना आवश्यक है परंतु केवल भाग्य पर विश्वास करके अपने आप को अपने दायरे तक समेट लेना पुरुषार्थ के साथ छलावा भी हो सकता है । इसलिए सबसे आसान मार्ग है….. कर्म करना….. सतत् प्रयास करना क्योंकि प्रयास से ही यश की प्राप्ति होती है । फल की इच्छा रखने वाला व्यक्ति असफल होने के बाद भयंकर पीड़ा से ग्रसित हो जाता है । अतः फल की इच्छा रखे बिना कर्म करने वाला व्यक्ति असफल हो जाने पर भी निराश नहीं होता है ।
किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के पहले आप यह चिंतन करें कि आप यह कार्य क्यों करना चाहते हैं ? यदि जीवन में कुछ बनने या  कर दिखाने का मसला है तो एक आलोचक की दृष्टि से अपने को परखिए कि क्या आपके अंदर उस कार्य के लिए आवश्यक योग्यता है ? दूसरों को देखकर वैसा ही बनने की उमंग खतरनाक सिद्ध  होती है । अतीत का चिंतन कर के भविष्य की सारी योजनाओं को नियोजित करके वर्तमान में सभी कार्य समय पर और समझदारी के साथ करना की बुद्धिमता है ।  यदि कुछ त्रुटियों हो भी जाए तो मन को कुंठित न करें ।  ‘जो हुआ सो हुआ ऐसा ‘  सोचकर दृढ़ प्रतिज्ञा हो जाए कि भविष्य में ऐसी पुनः  त्रुटियां नहीं होगी । प्रमाद या आलसवश अपने कर्तव्यों को भुलाने वाला व्यक्ति समय निकल जाने  पर खून के आँसू रोने के लिए विवश हो जाता है। सभी कार्य , उनके विकास की प्रक्रिया एवं परिणाम सभी एक दूसरे पर निर्भर एवं प्रति पूरक है। कार्तिक माह में गेहूं की बुआई करने वाला किसान ही चैत्र मास में लहलहाती फसल को काटने खेत में जाएगा । सत्र के दौरान मन लगाकर अध्ययन करने वाला विद्यार्थी परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकता है । प्रतिदिन नियमानुसार अखाड़े में अभ्यास करने वाला पहलवान कुश्ती की प्रतियोगिता में अपने प्रतिद्वंदी को पटकनी  देने की कुब्बत रख सकता है।  सफलता संभव है बशर्ते कि हम प्रयत्नशील रहे। हम चाहे किसी भी अवस्था में रहे, अपने कर्तव्य से मुख न मोड़े।
      एक टुकड़ा सुख और मुट्ठी भर खुशियों के लिए मनुष्य को कैसे-कैसे कर्म करने पड़ते हैं ? कुंदन की तरह चमकना है तो संघर्ष की ज्वाला में तपना ही पड़ेगा । जीवन अनमोल है। इसे व्यर्थ न गवाओं।
    अनुकूल समय की प्रतीक्षा में अपने धैर्य को बनाए रखने में पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है । भाग्य के चक्र को देवता भी अच्छी तरह से नहीं समझ पाए । कर्म – अकर्म और होनी- अनहोनी के जंजाल को कोई भी जीव नहीं सुलझा पाया है।  यह भाग्य का ही पुण्य प्रताप है कि ‘बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख’।  कदाचित बिना  परिश्रम के भाग्य का कोई अर्थ नहीं है । जंगल के राजा शेर को भी अपना पेट भरने के लिए शिकार पर जाना पड़ता है । ऐसे ही कोई भी जीव अनायास अपने आप उसके मुख में ग्रास बनने नहीं चला आता।
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सागर किनारे बैठा विशाल आती-जाती लहरों को बड़े ध्यान से देख रहा है । लहरें आती है फिर लौट जाती हैं,  ताकि वह वापस साहिल पर आ सके।
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फिल्म हीरोइन ना बनकर शालू एक कॉलगर्ल बन गई । वह एक दिन में तीन-चार लोगों के बिस्तर बदलती । उसकी इच्छाएं मर चुकी थी । आंखों में कोई सपना नहीं महीने में दस- पंद्रह हजार रुपए की कमाई हो जाती थी । ग्राहक के एक इशारे पर वह पलक झपकते ही बदन के सारे कपड़े उतार कर बिस्तर पर ढेर हो जाना ही उसकी जिंदगी थी । ग्राहकों की काम तृप्ति उसका धर्म था।
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बिहारी,  रश्मि की बेवफाई से आहत होकर बिहार लौट गया । अब वह बिहारी नहीं,  श्री अखिलेश सिन्हा बन गया । जिंदगी को नए सिरे से शुरू करने की योजना बनाने लगा।
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फिल्म पत्रकार राजजी के जीवन में कोई उतार-चढ़ाव नहीं है । रात दिन रात तीन-चार  बजे तक फिल्मी लेख– साक्षात्कार लिखना । दोपहर के बारह बजे तक सोना । फिल्मी पार्टियों में पेट भरकर भोजन करना । मुफ्त मिल गई तो महीने भर का शराब का कोटा एक ही बार में पी जाना । स्ट्रगलरों को छोटे-मोटे रोल दिला कर उनसे पच्चीस प्रतिशत कमीशन लेना। जीवन में उनके कोई लक्ष्य नहीं था।
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शेखर दो फिल्मों का हीरो बन चुका था ।  ‘गरीब जिंदगी की अजीब दास्तान’  फ्रांस फिल्म महोत्सव में दिखाई जा रही थी । ‘छक्का नंबर वन’  का मेन लीड रोल करने के लिए वह कई स्तर की तैयारी में व्यस्त है।
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स्वामी का केवल शुटिंग और  पर डे  तीन सौ रुपए से मतलब । बीवी बच्चों को सुख सुविधा देना उसकी पहली प्राथमिकता । बंबई में वह फिल्मी  कमाई से बढ़िया से गुजर बसर कर रहा है।
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रश्मि की पहली फिल्म सुपर फ्लॉप हो गई । इस वजह से उसे दो-तीन फिल्मों से निकाल बाहर कर दिया गया । फिल्मों में अपने आप को बनाए रखने के लिए वह जोरदार स्ट्रगल कर रही है।
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कुसुम को भी विशाल के प्यार पर पक्का भरोसा है । विशाल की तबीयत सुधर जाएगी तो वे दोनों ही शहर को छोड़कर कहीं और चले जाएंगे। जहाँ अपने प्यार की दुनिया बसाएंगे । विवाह के दिन ही वह अपने जुड़े में मोगरे का गजरा सजाएगी और विशाल के प्यारे-प्यारे बच्चों की माँ बनेगी।
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अच्युतानंद ने फिल्म लाइन छोड़ दी। अच्युतानंद और ताई अपनी बेटी सुरेखा की शादी विशाल से करने की तैयारी में मग्न है कि एक नई मुसीबत और आ गयी । विशाल पिछले तीन दिनों से घर नहीं लौटा।
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संदीप सुर्वे को भीड़ में खड़ा होने का काम मिल गया है । टीवी स्क्रीन पर अपना चेहरा देखकर वह गर्व और गौरव महसूस करता है । वह अपनी हिंदी सुधार रहा है । जिस दिन उसकी हिंदी सुधर जाएगी उस दिन से वह केवल डायलॉग वाले रोल ही करेगा।
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मुजफ्फरपुर जिले के दूर-दराज गाँव में रशीद खान ऐश की जिंदगी बिता रहा है । ब्लू फिल्म ‘सबको दिखा दूंगी’ के निर्माण के समय निर्माता बलजीत सिंह के तीन लाख लेकर वह कई महीनों तक भूमिगत रहा । अब अपने गाँव में वह एक राजनीतिक पार्टी का तालुका अध्यक्ष बन गया ।
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लालता प्रसाद उर्फ लल्ली उर्फ सन्नी अब ना जाने किस नाम से कहाँ क्या कर रहा है । लेकिन इतना तय है कि उसका  स्टेटस बढ़ा होगा । जमींदार का बेटा लालता प्रसाद  स्पॉट बॉय  लल्ली से रश्मि का ड्राइवर सन्नी बना, अब ना जाने क्या है , कहाँ है ,कुछ खबर नहीं।
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इस बंबई फिल्म नगरी में एक दो नहीं हजारों स्ट्रगलर सड़क की खाक छान रहे हैं । कुछ बंबई के हैं तो अधिकतर स्ट्रगलर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान और नेपाल से आते हैं । रहने, खाने-पीने की तकलीफ के साथ आर्थिक संकट का कष्ट झेलते हुए एक अच्छे मौके की तलाश में वह जी- जान से अपने को  कामयाब बनाने के लिए संघर्षरत रहता है । प्रत्येक स्ट्रगलर सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को अपना भगवान समझता है । उनके स्ट्रगल के दिनों की कहानी से प्रेरणा लेकर एक न एक दिन कुछ  कर दिखाने की तमन्ना के साथ दिन रात अपने आप को कड़े संघर्ष से लड़ने के लिए मुस्तैद करता रहता है। यहाँ ऐसा कोई नियम नहीं है कि फलां फलां समय तक संघर्ष करने के पश्चात आप सफल हो ही जायेंगे । इस इंडस्ट्री में निन्यानबे प्रतिशत संभावना असफलता की है और एक प्रतिशत संभावना सफलता की । सफलता- असफलता की तुलना में भाग्य के महत्व को बिल्कुल नकारा नहीं जा सकता I यहाँ जो जीता वही सिकंदर। जो फिट  वो हिट  बाकी सब फ्लॉप । बंबई महानगरी की फिल्मी जादूई नगरी की अपनी चमक है, अपना इतिहास है, जिसकी चकाचौंध से आकर्षित होकर हजारों ,लाखों फिल्मी दीवाने परवाने इस ओर खींचे चले आते हैं । यहाँ सफलता आसान नहीं है लेकिन एक बार सफल हो गए तो आपको इतना मान-सम्मान यश और धन की प्राप्ति होगी जिसकी कभी आपने कल्पना  नहीं की होगी । जीवन का दूसरा नाम संघर्ष है और फिल्मी दुनिया का संघर्ष सभी के बस की बात नहीं है ।  केवल जीवट व्यक्ति ही इस संघर्ष में टिक सकता है बाकी  ऐरे गैरे  नत्थू खैरे कुछ ही महीना ,वर्ष में अपनी हैसियत समझ कर इस  लाइन से दूर हो जाते हैं । स्ट्रगलरों के बारे में अगर विस्तार से कहानी लिखी जाए तो एक स्ट्रगलर  महापुराण तैयार  हो सकता है । चालीस स्ट्रगलरों की कहानी एक जैसी नहीं है।  सभी के जीवन में हजारों रंग है। अनेकों मोड़ है।  भिन्न-भिन्न सिद्धांत और आदर्श है । इस उपन्यास में कुछ स्ट्रगलरों के जीवन गाथा द्वारा उनके संघर्ष और दर्द की भावना को रेखांकित करने का प्रयास किया गया। लेकिन मुझे लगता है कि मैं इस प्रयास में आंशिक रूप से भी सफल नहीं रहा। कहानी में जहाँ – तहाँ बिखराव है। पात्रों के चरित्र – चित्रांकन में संघर्ष की पीड़ा नहीं आ पाई । भाषा और भाव में एकरूपता के चक्कर में उपन्यास में कहीं – कहीं कुछ और ही अर्थ – अनर्थ होने लगे ।  हालांकि उपन्यास लेखन का पहला प्रयास है, लेकिन आप सब पाठक श्रेष्ठ मुझे मेरी त्रुटियों के लिए अवश्य क्षमा करेंगे । इस उपन्यास का कुछ न कुछ अंत होना ही चाहिए हालांकि स्ट्रगल की कोई सीमा नहीं है,  कोई अंत नहीं है । प्रस्तुत है इस उपन्यास में स्ट्रगलर का अंतिम पन्ना ……
     आज  शुक्रवार का दिन है। सुबह सात-आठ बजे तक सभी दैनिक अखबार अपने – अपने  पाठकों के घर में या उनके हाथ में पहुँच चुके हैं । सभी अखबारों में प्रथम पृष्ठ पर मुख्य समाचार छपे हैं लेकिन दो खबरें जो विशेष रूप से बॉक्स में  छापी गई हैं उस पर ध्यान देने की जरूरत है ।
       एक समाचार की हेडलाईन है ,  “फ्रांस फिल्म महोत्सव में भारतीय फिल्म  ‘गरीब जिंदगी की अजीब दास्तान’ सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार से सम्मानित” । दूसरे समाचार की हेडलाईन हैं, ‘स्ट्रगलर बना शूटर : पुलिस ने लल्ली उर्फ सन्नी को एक मुठभेड़ में मार गिराया ।  विश्वस्त सूत्रों के अनुसार शूटर ने खार सिग्नल पर एक मिल मालिक एवं ताड़देव ए. सी. मार्केट में एक हीरा व्यापारी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी थी ।’
   कई अखबारों के तीसरे पृष्ठ पर महानगर हलचल के कॉलम में एक छोटा – सा समाचार छपा है,  ‘बांद्रा के सहकार बाजार के पास कचरे के डिब्बे  के पास एक अज्ञात व्यक्ति की लावारिस लाश पड़ी मिली , लाश का पोस्टमार्टम किया गया तो पता चला कि वह एड्स रोग के अंतिम चरण में पहुँच चुका था । खबरों के साथ एक तस्वीर भी थी जिसे कुसुम ने देखते ही पहचान लिया …..विशाल की तस्वीर है ।
अखबार के किसी पन्ने पर एक खबर है,  ‘रश्मि दक्षिण भारत की फिल्में करेगी।’
    उसी अखबार में एक पन्ने पर  शशांक  द्वारा निर्देशित एवं अभिनीत प्ले , ‘तकदीर का तमाशा’  की समीक्षा की गई थी । जिसके सफलतम पच्चीस शो पृथ्वी थियेटर में हो चुके हैं। शशांक के अभिनय की  प्रशंसा करते हुए  समीक्षक ने लिखा है कि ओमपुरी , नसीरूद्दीन शाह  और रघुवीर यादव की परंपरा को शशांक रस्तोगी आगे बढ़ाएंगे ।
 इसी अखबार में पिछले तीन महीनों से छप रहे उपन्यास  ‘स्ट्रगलर’  की आखिरी कड़ी भी छपी है।
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पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त………..
स्ट्रगलरों का कारवां कभी रुकने वाला नहीं है…….
हारना जीतना यूं ही चलता रहेगा मुम्बइया बॉलीवुड में।।।
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